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धनतेरस 2026: धनत्रयोदशी की तिथि, पूजा का समय और महत्व

धनतेरस, जिसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं, कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को पड़ता है और प्रायः लक्ष्मी पूजा से दो दिन पहले दीपोत्सव की शुरुआत करता है। इस दिन लक्ष्मी जी और कुबेर के साथ देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की पूजा होती है, और यह सर्राफ़ा बाज़ारों का साल का सबसे व्यस्त दिन भी है। नीचे प्रदोष काल का नियम और शाम की पूजा की विधि दी गई है, और 2026 की तिथि तथा पूजा का समय नई दिल्ली के लिए निकाला गया है।

धनतेरस 2026: तारीख और समय (नई दिल्ली)

धनतेरस 2026 शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है (नई दिल्ली)। 2026 में धनतेरस 29 अक्टूबर को पड़ने वाले करवा चौथ के 8 दिन बाद और 8 नवंबर को पड़ने वाले दिवाली (लक्ष्मी पूजा) से 2 दिन पहले है।

तारीखशुक्रवार, 6 नवंबर 2026
तिथिकार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (अमांत पंचांग में आश्विन)
त्रयोदशी तिथि6 नवंबर, 10:32 से 7 नवंबर, 10:49 तक
प्रदोष काल6 नवंबर, 17:29 से 20:07 तक

सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।

6 नवंबर 2026 का पंचांग · Panchang for 6 November 2026

धनतेरस: अर्थ, नियम और परंपराएँ

धन्वंतरि, लक्ष्मी और धनतेरस का अर्थ

धनतेरस नाम धनत्रयोदशी का छोटा रूप है: धन यानी संपदा और तेरस यानी तेरहवीं तिथि। पुराणों के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब देवताओं के वैद्य और आयुर्वेद के अधिष्ठाता भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, और परंपरा उनका प्राकट्य इसी तिथि को मानती है। इसलिए यह दिन धन्वंतरि जयंती भी है, और बहुत से लोग नाम के ‘धन’ को केवल पैसे से नहीं, उनसे भी जोड़ते हैं। पुरानी कहावत भी है, ‘पहला सुख निरोगी काया’।

दूसरी धारा सीधे-सीधे समृद्धि की है। शाम को लक्ष्मी जी और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की पूजा होती है, और धातु, ख़ासकर सोना, चाँदी या नए बर्तन खरीदना लक्ष्मी पूजा से पहले घर में समृद्धि के स्वागत के रूप में देखा जाता है। धनतेरस पाँच दिन के दीपोत्सव का पहला दिन है, जिसके बाद नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज आते हैं।

तीसरी परंपरा शाम के दीपक की है। कथा है कि राजा हिम के पुत्र की मृत्यु विवाह के बाद चौथी रात को होनी लिखी थी। उस रात उसकी नवविवाहिता पत्नी ने पति को सोने नहीं दिया। उसने चारों ओर दीपक जलाए, द्वार पर अपने सोने-चाँदी के गहनों का ढेर लगा दिया और रात भर कहानियाँ और गीत सुनाती रही। यमराज सर्प के रूप में आए तो उस चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं, वे ढेर पर बैठकर सुबह तक गीत सुनते रहे और भोर होते ही खाली हाथ लौट गए। इसी की याद में धनतेरस की शाम यम के नाम दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपदान कहते हैं।

धनतेरस की तिथि कैसे तय होती है

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी है, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के अमांत पंचांग में यही दिन आश्विन कृष्ण त्रयोदशी कहलाता है, क्योंकि वहाँ महीना अमावस्या तक चलता है। तिथि एक ही है, बस महीने के नाम अलग हैं। यह कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि है और अंग्रेज़ी कैलेंडर में प्रायः मध्य अक्टूबर से नवंबर की शुरुआत के बीच पड़ती है।

निर्णायक समय प्रदोष काल है, यानी सूर्यास्त के बाद लगभग ढाई घंटे की वह अवधि जिसमें लक्ष्मी-कुबेर पूजा और यम दीपदान होते हैं, और नियम यह है कि प्रदोष में त्रयोदशी विद्यमान हो। तिथि शायद ही सूर्योदय से शुरू होती है, इसलिए हो सकता है कि वह एक शाम को चल रही हो और अगले दिन सूर्यास्त से पहले ख़त्म हो जाए, या दोनों शामों के प्रदोष को केवल आंशिक रूप से छुए। पंचांग प्रदोष नियम से इसका निर्णय करते हैं, और उसकी व्याख्या में छोटे-छोटे अंतर के कारण ‘धनतेरस कब है’ के कभी-कभी दो जवाब मिलते हैं। इस पृष्ठ पर तिथि नई दिल्ली के प्रदोष काल को देखकर तय की गई है।

प्रदोष के भीतर भी कई परिवार और व्यापारी उस समय को श्रेष्ठ मानते हैं जब स्थिर लग्न, प्रायः वृषभ, उदित हो। खरीदारी के लिए बहुत से लोग चौघड़िया भी देखते हैं, जिसमें दिन और रात दोनों को आठ-आठ भागों में बाँटकर शुभ हिस्से चुने जाते हैं।

धनतेरस पूजा विधि और यम दीपदान

सुबह का समय सफ़ाई का है। घर, दुकान और ख़ासकर मुख्य द्वार को झाड़-पोंछकर धोया जाता है, और रंगोली तथा दीयों से आने वाले दिनों के लिए द्वार सजाया जाता है। खरीदारी दिन भर चलती है, हो सके तो किसी शुभ चौघड़िया में, और सामान शाम से पहले घर ले आया जाता है ताकि उसे पूजा में रखा जा सके।

प्रदोष काल में चौकी पर गणेश जी के साथ लक्ष्मी जी, कुबेर और धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र रखे जाते हैं। संकल्प के बाद उन्हें रोली, अक्षत, फूल, धूप, घी का दीपक और नैवेद्य अर्पित किया जाता है, जिसमें प्रायः गुड़ की मिठाई या गुड़ मिला साबुत धनिया होता है। नए सिक्के और बर्तन भी देवताओं के सामने रखकर पूजे जाते हैं। धन्वंतरि जयंती मनाने वाले परिवार घर के आरोग्य के लिए विशेष प्रार्थना करते हैं, और आयुर्वेद के वैद्य उन्हें अपनी परंपरा के आदि प्रवर्तक के रूप में पूजते हैं।

इसके बाद यम दीपदान होता है। आटे या मिट्टी से बना चार बत्तियों वाला चौमुखा दीपक तेल भरकर जलाया जाता है और मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रखा जाता है, क्योंकि दक्षिण यम की दिशा मानी जाती है। इसके साथ प्रार्थना की जाती है कि परिवार में किसी की अकाल मृत्यु न हो।

धनतेरस पर क्या करें, क्या न करें

इस दिन कुछ नया खरीदना ही मुख्य रिवाज है। पारंपरिक रूप से ये चीज़ें खरीदी जाती हैं: सोने-चाँदी के सिक्के या गहने; पीतल, स्टील या चाँदी के बर्तन; नई झाड़ू, जिसे कई घरों में दरिद्रता को बुहार देने वाली लक्ष्मी का रूप माना जाता है; और साबुत धनिया, जो पूजा में चढ़ाकर घर की कीमती चीज़ों के साथ रखा जाता है और बाद में बोया जाता है। ये समृद्धि के स्वागत की परंपराएँ हैं, किसी लाभ का आश्वासन नहीं, और बहुत से परिवार बस एक छोटी, काम की चीज़ खरीद लेते हैं।

परंपरागत रूप से इस दिन चाकू, कैंची जैसी धारदार चीज़ें, लोहा और काले रंग की वस्तुएँ खरीदने से बचा जाता है, और बहुत से लोग उस शाम उधार देने या कीमती चीज़ें किसी को देने से परहेज़ करते हैं। कई घरों में नए बर्तन खाली नहीं लाए जाते, उनमें पानी, अनाज या मिठाई भरकर ही भीतर ले जाया जाता है। यम का दीपक ऐसी जगह रखें जहाँ वह गिर न सके। इस दिन बाज़ारों में सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है, इसलिए भरोसेमंद सुनार से ही खरीदें और हॉलमार्क ज़रूर जाँच लें।

अलग-अलग प्रदेशों में धनतेरस

महाराष्ट्र में दिवाली का उत्सव एक दिन पहले वसुबारस से शुरू हो जाता है, जब गाय और बछड़े की पूजा होती है, और धनतेरस पर धणे-गूळ, यानी गुड़ मिला धनिया, नैवेद्य के रूप में चढ़ाया जाता है। गुजराती घरों और व्यापारी परिवारों में दूध या पंचामृत से धोए गए सिक्कों के साथ लक्ष्मी पूजा होती है, और देश भर के शहरों में सर्राफ़ा और बर्तन बाज़ारों का यह साल का सबसे व्यस्त दिन होता है।

दक्षिण भारत में यह दिन धन त्रयोदशी कहलाता है, पर वहाँ दीपावली का मुख्य उत्सव नरक चतुर्दशी की भोर के तेल स्नान पर केंद्रित है, इसलिए धनतेरस अपेक्षाकृत शांत रहता है, हालाँकि इस दिन सोना खरीदने का चलन वहाँ भी ख़ूब बढ़ा है। नेपाल में लगभग इन्हीं दिनों काग तिहार से तिहार पर्व शुरू होता है, जब कौवों को यम का दूत मानकर भोजन दिया जाता है। त्रयोदशी प्रदोष व्रत की तिथि भी है, इसलिए धनतेरस अक्सर शिव के प्रदोष व्रत के साथ पड़ता है, और यह व्रत रखने वाले उसी शाम शिव पूजा करते हैं।

धनतेरस का ज्योतिषीय महत्व

कृष्ण त्रयोदशी पर चंद्रमा सूर्य से केवल 24 से 36 अंश पीछे रह जाता है और भोर से पहले पूर्व दिशा में पतली कला के रूप में उगता है। मुहूर्त चिंतामणि में इस तिथि के स्वामी कामदेव बताए गए हैं, और इसे तृतीया तथा अष्टमी के साथ जया वर्ग में रखा गया है, जिसका अर्थ ही विजय है। कामना और विजय, दोनों भाव उस दिन से मेल खाते हैं जो घर में समृद्धि के स्वागत को समर्पित है।

इन दिनों सूर्य प्रायः निरयण तुला राशि में होता है, जो उसकी नीच राशि है। तुला के स्वामी शुक्र हैं, जो वैदिक ज्योतिष में ऐश्वर्य, सुख-सुविधा और कीमती वस्तुओं के कारक हैं, और यह बात धातु और गहने खरीदने की परंपरा से मेल खाती है। चंद्रमा प्रायः कन्या या तुला राशि में, अक्सर हस्त या चित्रा नक्षत्र में होता है। चित्रा के देवता त्वष्टा हैं, जिन्हें दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है, और नए औज़ारों, बर्तनों और गहनों के दिन के लिए यह उपयुक्त संयोग है।

विष्टि करण, यानी भद्रा, कृष्ण त्रयोदशी पर नहीं पड़ता; वह अगली चतुर्दशी के पहले आधे भाग में आता है। पूजा के लिए स्थिर लग्न को प्राथमिकता दी जाती है, और इस मौसम में वृषभ लग्न प्रायः प्रदोष काल के भीतर उदित होता है, इसलिए व्यापारी लक्ष्मी-कुबेर पूजा इसी समय शुरू करना पसंद करते हैं।

इस सप्ताह और क्या है

नवंबर 2026 के और व्रत-त्योहार

धनतेरस 2026: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

धनतेरस 2026 कब है और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?

धनतेरस 2026 शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है (नई दिल्ली)। धनतेरस वह कृष्ण त्रयोदशी है जो सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में विद्यमान हो, और अधिकतर वर्षों में यह लक्ष्मी पूजा से दो दिन पहले आती है। नई दिल्ली के लिए 2026 की तिथि और शाम का पूजा मुहूर्त इस पृष्ठ पर दिया गया है।

कुछ पंचांगों में धनतेरस 2026 की तारीख अलग क्यों है?

त्रयोदशी शायद ही सूर्योदय से शुरू होती है। अगर वह दो शामों के प्रदोष को आंशिक रूप से छुए या सूर्यास्त से पहले ख़त्म हो जाए, तो पंचांगकार प्रदोष नियम को थोड़े अलग ढंग से लागू करके अलग दिन चुन सकते हैं। आपका पारिवारिक पंचांग कौन सा नियम मानता है, यह देख लें।

धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ माना जाता है?

परंपरा से सोने-चाँदी के सिक्के या गहने, पीतल, स्टील या चाँदी के बर्तन, नई झाड़ू और साबुत धनिया। ये समृद्धि के स्वागत की परंपराएँ हैं, किसी लाभ का आश्वासन नहीं, और बहुत से लोग बस एक काम की चीज़ खरीदते हैं।

धनतेरस 2026 पर खरीदारी का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

खरीदारी का कोई एक शास्त्रीय मुहूर्त नहीं है। बहुत से लोग दिन में कोई शुभ चौघड़िया चुनते हैं, और कुछ शाम की पूजा से पहले खरीदारी पूरी कर लेते हैं ताकि सामान पूजा में रखा जा सके। नई दिल्ली का प्रदोष काल तिथि के साथ दिया गया है।

यम दीपदान क्या है और दीपक कैसे रखा जाता है?

यह धनतेरस की शाम यमराज के नाम जलाया जाने वाला दीपक है। आटे या मिट्टी का चार बत्तियों वाला दीपक प्रदोष काल में जलाकर मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण की ओर मुँह करके रखा जाता है, और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

क्या धनतेरस और धन्वंतरि जयंती एक ही दिन हैं?

हाँ, दोनों एक ही त्रयोदशी पर पड़ते हैं। परंपरा मानती है कि देवताओं के वैद्य धन्वंतरि समुद्र मंथन से इसी तिथि को प्रकट हुए थे, इसलिए यह दिन धनतेरस के साथ उनकी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार

2026 का त्योहार कैलेंडर

हर त्योहार की तारीख उसके शास्त्रीय नियम को नई दिल्ली के पंचांग पर लागू करके निकाली गई है और प्रकाशित पंचांगों से मिलाई गई है। क्षेत्र और परिवार की परंपराएँ अलग हो सकती हैं; अपने घर के लिए कुल पुरोहित या स्थानीय पंचांग की बात को अंतिम मानें।