दशहरा 2026: विजयादशमी की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व
दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहते हैं, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को शारदीय नवरात्रि के ठीक बाद मनाया जाता है। यह विजय का पर्व है, चाहे वह रावण पर श्रीराम की जीत हो या महिषासुर पर देवी दुर्गा की। नीचे तिथि तय होने का नियम, पूजा का क्रम और परंपराएँ दी गई हैं, साथ में नई दिल्ली के हिसाब से निकाली गई 2026 की तिथि और दोपहर का विजय मुहूर्त भी।
दशहरा 2026: तारीख और समय (नई दिल्ली)
दशहरा 2026 मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है (नई दिल्ली)। 2026 में दशहरा 11 अक्टूबर को पड़ने वाले शारदीय नवरात्रि के 9 दिन बाद और 29 अक्टूबर को पड़ने वाले करवा चौथ से 9 दिन पहले है।
| तारीख | मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 |
|---|---|
| तिथि | आश्विन शुक्ल दशमी |
| दशमी तिथि | 20 अक्टूबर, 12:52 से 21 अक्टूबर, 14:13 तक |
| अपराह्न | 20 अक्टूबर, 13:13 से 15:28 तक |
| विजय मुहूर्त (दिन का 11वाँ मुहूर्त) | 20 अक्टूबर, 13:58 से 14:43 तक |
पंचांगों में अंतर: कुछ पंचांगों में 19 अक्टूबर या 21 अक्टूबर दिया गया है।
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
दशहरा: अर्थ, नियम और परंपराएँ
विजयादशमी किन विजयों की याद है
विजयादशमी का अर्थ है विजय की दशमी। दशहरा नाम को प्रायः ‘दश-हरा’ से जोड़ा जाता है, यानी दस का हरण, जिसे रावण के दस सिरों के अंत के रूप में समझा जाता है। उत्तर भारत में यह दिन श्रीराम का है। परंपरा के अनुसार उन्होंने इसी दशमी को रावण का वध किया था, इसलिए नवरात्रि भर चलने वाली रामलीला इसी युद्ध के मंचन और रावण के पुतले के दहन पर पूरी होती है।
इसी तिथि से दो और कथाएँ जुड़ी हैं। दुर्गा सप्तशती बताती है कि देवताओं के सम्मिलित तेज से प्रकट हुई देवी दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया। नौ रातों को इस युद्ध का और दसवें दिन को देवी की विजय का प्रतीक माना जाता है, इसीलिए बंगाल में इस दिन देवी की विदाई होती है। महाभारत के अनुसार राजा विराट के यहाँ अज्ञातवास से पहले पांडवों ने अपने शस्त्र एक शमी वृक्ष में छिपाए थे, और मान्यता है कि अर्जुन ने इसी दिन उन्हें वापस निकाला। दोपहर की शमी पूजा इसी प्रसंग से आई है। हर कथा का अंत अहंकार की हार से होता है, इसलिए यह दिन नई शुरुआत के लिए शुभ माना गया, चाहे वह वर्षा ऋतु के बाद राजाओं का सैन्य अभियान हो या बच्चे का पहली बार अक्षर लिखना।
दशहरे की तिथि कैसे निकाली जाती है
दशहरा आश्विन शुक्ल दशमी है, यानी आश्विन मास के बढ़ते चंद्रमा वाले पखवाड़े की दसवीं तिथि। शुक्ल पक्ष का पर्व होने से इसका महीना दोनों पद्धतियों में आश्विन ही रहता है, चाहे उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग हो, जिसमें महीना पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलता है, या गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण का अमांत पंचांग, जिसमें महीना अमावस्या से अमावस्या तक गिना जाता है। यह नवरात्रि की नवमी के अगले दिन आता है और अंग्रेज़ी कैलेंडर में प्रायः सितंबर के आख़िरी दिनों से अक्टूबर के अंत के बीच पड़ता है।
इस पर्व का निर्णायक समय अपराह्न है, यानी दोपहर बाद का भाग, और नियम है कि उस समय दशमी विद्यमान हो। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के दिन को लगभग 48 मिनट के पंद्रह मुहूर्तों में बाँटा जाता है, और इसी अपराह्न के भीतर ग्यारहवाँ मुहूर्त आता है, जिसे विजय मुहूर्त कहते हैं। उस दोपहर श्रवण नक्षत्र भी हो तो दिन और श्रेष्ठ माना जाता है। दशमी किसी दिन दोपहर के आसपास शुरू होकर अगले दिन दोपहर तक रह सकती है। ऐसे में दोनों दिन अपराह्न में दशमी मिल सकती है, या किसी भी दिन पूरे अपराह्न तक न रहे। निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु ऐसे मामलों के नियम देते हैं, पर पंचांगकार उन्हें कभी-कभी अलग ढंग से पढ़ते हैं, इसीलिए ‘दशहरा कब है’ खोजने पर किसी वर्ष दो तारीखें दिख जाती हैं। इस पृष्ठ पर तिथि नई दिल्ली के अपराह्न को आधार मानकर निकाली गई है।
दशहरा पूजा विधि: अपराजिता पूजन से रावण दहन तक
नौ दिन का व्रत रखने वाले परिवार सुबह पारण करते हैं, और जहाँ नवरात्रि के पहले दिन जौ बोए गए थे, वहाँ उगे हुए जवारे देवी को चढ़ाए जाते हैं। दोपहर में घर के ईशान कोण, यानी उत्तर-पूर्व दिशा में साफ़ की गई जगह पर देवी अपराजिता का पूजन फूल, रोली, अक्षत और दीपक से होता है। फिर परिवार शमी वृक्ष के पास जाकर उसकी परिक्रमा करता है, जल, अक्षत और दीपक चढ़ाता है और सौभाग्य के प्रतीक के रूप में बाँटने के लिए कुछ पत्तियाँ तोड़ लेता है। पहले इसके साथ सीमोल्लंघन जुड़ा था, यानी गाँव की सीमा को प्रतीक रूप में पार करना, जैसा राजा अभियान पर निकलते समय करते थे।
इसी दिन शस्त्र पूजा भी होती है। हथियार, औज़ार, बही-खाते, मशीनें और वाहन साफ़ करके उन पर रोली लगाई जाती है और उनका पूजन होता है। दक्षिण भारत में इसे आयुध पूजा कहते हैं और वहाँ यह प्रायः नवमी को होती है। गोधूलि बेला में रामलीला के अंतिम दृश्य के बाद रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले आतिशबाज़ी के बीच जलाए जाते हैं, और फिर लोग बड़ों से मिलने जाते हैं, उनके पैर छूते हैं और मिठाई बाँटते हैं। लोक मान्यता है कि इस दिन नीलकंठ पक्षी का दिखना शुभ होता है।
दशहरे पर क्या करें, क्या न करें
विजयादशमी साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में गिनी जाती है, यानी उन दिनों में जो अपने आप में शुभ हैं। इसलिए परंपरा में वाहन, सोना या ज़मीन-मकान खरीदने, दुकान खोलने या नई पढ़ाई शुरू करने के लिए अलग मुहूर्त नहीं देखा जाता, हालाँकि सबसे ज़रूरी कामों के लिए बहुत से परिवार दोपहर का विजय मुहूर्त ही चुनते हैं। नए या धुले कपड़े, बड़ों का आशीर्वाद और शमी या आपटा की पत्तियों का आदान-प्रदान लगभग हर जगह का रिवाज है।
दक्षिण के कई घरों में नवमी को देवी के सामने रखी गई किताबें और औज़ार विजयादशमी की सुबह तक छुए नहीं जाते, और उस सुबह की पहली पढ़ाई या पहला काम नई शुरुआत माना जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन झगड़े और कड़वे बोल से बचा जाता है। शमी की थोड़ी-सी पत्तियाँ ही लें, पेड़ को उजाड़ें नहीं। रावण दहन की भीड़ में बच्चों को पास रखें, आग और पटाखों से दूरी बनाए रखें और स्थानीय प्रशासन के निर्देश मानें।
देश-विदेश में दशहरे के अलग रंग
वाराणसी के पास रामनगर की रामलीला लगभग एक महीने चलती है और कथा के साथ-साथ कस्बे के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुँचती है। राजस्थान में कोटा का दशहरा मेला प्रसिद्ध है। हिमाचल प्रदेश का कुल्लू दशहरा विजयादशमी से ही शुरू होकर एक सप्ताह चलता है, जिसमें रघुनाथ जी का रथ खींचा जाता है और घाटी भर के गाँवों से देवी-देवता लाए जाते हैं। मैसूरु दसरा का मुख्य आकर्षण जंबू सवारी है, जिसमें देवी चामुंडेश्वरी सोने के हौदे में हाथी पर नगर भ्रमण करती हैं। छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा लगभग 75 दिन चलता है और देवी दंतेश्वरी को समर्पित है, इसमें रावण का कोई प्रसंग नहीं है।
बंगाल में बिजया दशमी पर विसर्जन से पहले विवाहित महिलाएँ सिंदूर खेला की रस्म निभाती हैं, और शाम को बिजया की शुभकामनाओं और मिठाइयों के साथ रिश्तेदारों से मिलना होता है। महाराष्ट्र में आपटा की पत्तियाँ ‘सोना’ कहकर बाँटी जाती हैं, जिसके पीछे राजा रघु, युवा शिष्य कौत्स और कुबेर द्वारा पेड़ों पर बरसाए गए सोने की कथा है। केरल में विद्यारंभम पर छोटे बच्चे चावल से भरी थाली में पहले अक्षर लिखते हैं, तमिलनाडु के कुलशेखरपट्टिनम दसरा में श्रद्धालु मन्नत लेकर तरह-तरह के वेश और मुखौटे धारण करते हैं, और गुजरात में गरबा की आख़िरी रात के बाद फाफड़ा-जलेबी का चलन है। नेपाल में विजया दशमी दशैं का मुख्य दिन है, जब बड़े अपने छोटों को टीका और जमरा, यानी जौ के अंकुर, देते हैं, और विदेशों में त्रिनिदाद की खुले मैदान वाली रामलीला खास तौर पर जानी जाती है।
विजयादशमी का ज्योतिषीय पक्ष
दशमी पर चंद्रमा सूर्य से 108 से 120 अंश आगे होता है। मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार इस तिथि के स्वामी यम हैं, जो धर्म और मृत्यु के अधिपति माने जाते हैं, और पंचमी तथा पूर्णिमा की तरह दशमी भी पूर्णा तिथियों में आती है। पूर्णता की यह तिथि उस पर्व से मेल खाती है जो एक अध्याय के अंत और नए आरंभ का उत्सव है। शुक्ल पक्ष की दशमी पर विष्टि करण, यानी भद्रा, कभी नहीं पड़ता, इसलिए इस दिन भद्रा का विचार नहीं करना पड़ता।
इन दिनों सूर्य निरयण कन्या राशि में, कभी-कभी तुला के आरंभ में होता है, इसलिए दशमी का चंद्रमा प्रायः मकर राशि में मिलता है, जो साहस के कारक मंगल की उच्च राशि है। नक्षत्र अक्सर श्रवण होता है, जिसके देवता विष्णु हैं, और अपराह्न में श्रवण को श्रेष्ठ मानने की परंपरा इस दिन को विष्णु के अवतार श्रीराम से जोड़ती है। दिन का ग्यारहवाँ मुहूर्त होने से विजय मुहूर्त का समय स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के साथ बदलता है, और यात्रा, हस्ताक्षर और शमी पूजा के लिए बहुत से लोग इसी को चुनते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, अक्षय तृतीया और आधे दिन वाली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के साथ विजयादशमी साढ़े तीन मुहूर्तों में पूरे दिन के मुहूर्त के रूप में गिनी जाती है।
इस सप्ताह और क्या है
- शनिवार, 17 अक्टूबर — तुला संक्रांति
- गुरुवार, 22 अक्टूबर — पापांकुशा एकादशी
अक्टूबर 2026 के और व्रत-त्योहार
- मंगलवार, 6 अक्टूबर — इंदिरा एकादशी
- शनिवार, 10 अक्टूबर — सर्व पितृ अमावस्या
- शनिवार, 10 अक्टूबर — आश्विन अमावस्या
- रविवार, 11 अक्टूबर — शारदीय नवरात्रि
- सोमवार, 26 अक्टूबर — आश्विन पूर्णिमा
- गुरुवार, 29 अक्टूबर — करवा चौथ
दशहरा 2026: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दशहरा 2026 कब है और विजय मुहूर्त कितने बजे है?
दशहरा 2026 मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है (नई दिल्ली)। दशहरा आश्विन शुक्ल की वह दशमी है जो अपराह्न में विद्यमान हो, और विजय मुहूर्त उस दिन का ग्यारहवाँ मुहूर्त है। नई दिल्ली के लिए 2026 की तिथि और मुहूर्त का समय इसी लेख के साथ दिया गया है।
कुछ पंचांगों में दशहरा 2026 अलग दिन क्यों दिखाया गया है?
दशमी अक्सर दिन के बीच में शुरू या ख़त्म होती है, इसलिए वह दो दिनों के अपराह्न में मिल सकती है, या किसी भी दिन पूरे अपराह्न तक नहीं रहती। तब पंचांगकार शास्त्रों के निर्णय-नियम लगाते हैं, जिनमें श्रवण नक्षत्र का भी विचार होता है, और उनके निष्कर्ष हमेशा एक जैसे नहीं होते।
दशहरा 2026 पर रावण दहन कितने बजे होगा?
रावण दहन परंपरा से गोधूलि बेला में, सूर्यास्त के कुछ देर बाद, रामलीला का अंतिम दृश्य पूरा होने पर किया जाता है। इसका कोई एक शास्त्रीय मुहूर्त नहीं है। हर आयोजन समिति अपना समय तय करती है, इसलिए स्थानीय घोषणा देखें।
क्या दशहरा और विजयादशमी एक ही हैं?
हाँ। विजयादशमी इस दिन का शास्त्रीय नाम है और दशहरा लोक में प्रचलित नाम। बंगाल में इसे बिजया दशमी कहते हैं, कर्नाटक में दसरा, और नेपाल में यह दशैं का मुख्य दिन है।
क्या दशहरे पर गाड़ी खरीदना या नया काम शुरू करना शुभ है?
परंपरा में विजयादशमी साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में से एक है, इसलिए खरीदारी और नए आरंभ के लिए अलग मुहूर्त की ज़रूरत नहीं मानी जाती। फिर भी बहुत से लोग सबसे महत्वपूर्ण काम दोपहर के विजय मुहूर्त में करना पसंद करते हैं।
क्या दशहरा हमेशा नवरात्रि समाप्त होने के अगले दिन होता है?
आम तौर पर हाँ। नवरात्रि नवमी पर पूरी होती है और उसके बाद विजयादशमी आती है। तिथियों के घटने-बढ़ने से कभी-कभी नवमी और दशमी एक ही दिन पड़ जाती हैं। नौ दिन का व्रत रखने वाले दशमी को पारण करते हैं।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- दशहरा 2027 — शनिवार, 9 अक्टूबर 2027
- पिछला त्योहार: शारदीय नवरात्रि 2026 — 11 अक्टूबर
- अगला त्योहार: करवा चौथ 2026 — 29 अक्टूबर
- 2026 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2026 का त्योहार कैलेंडर
- बुधवार, 14 जनवरी — मकर संक्रांति
- शुक्रवार, 23 जनवरी — वसंत पंचमी
- रविवार, 15 फरवरी — महाशिवरात्रि
- मंगलवार, 3 मार्च — होलिका दहन
- बुधवार, 4 मार्च — होली
- गुरुवार, 19 मार्च — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 26 मार्च — राम नवमी
- गुरुवार, 2 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 19 अप्रैल — अक्षय तृतीया
- बुधवार, 29 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- सोमवार, 17 अगस्त — नाग पंचमी
- शुक्रवार, 28 अगस्त — रक्षा बंधन
- शुक्रवार, 4 सितंबर — कृष्ण जन्माष्टमी
- सोमवार, 14 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- रविवार, 27 सितंबर — पितृ पक्ष
- शनिवार, 10 अक्टूबर — सर्व पितृ अमावस्या
- रविवार, 11 अक्टूबर — शारदीय नवरात्रि
- मंगलवार, 20 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- गुरुवार, 29 अक्टूबर — करवा चौथ
- शुक्रवार, 6 नवंबर — धनतेरस
- रविवार, 8 नवंबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- रविवार, 8 नवंबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- मंगलवार, 10 नवंबर — गोवर्धन पूजा
- बुधवार, 11 नवंबर — भाई दूज
- रविवार, 15 नवंबर — छठ पूजा
- शुक्रवार, 20 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- मंगलवार, 24 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा