वसंत पंचमी 2026: सरस्वती पूजा की तिथि, मुहूर्त और परंपराएँ
वसंत पंचमी, जिसे बसंत पंचमी और श्री पंचमी भी कहते हैं, माघ शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है और यह विद्या, वाणी और संगीत की देवी सरस्वती का पर्व है। यहाँ इसकी कथाएँ, पूर्वाह्न से तिथि तय करने का नियम और पूजा विधि दी गई हैं, और 2026 की तिथि तथा पूजा मुहूर्त नई दिल्ली के लिए निकाले गए हैं।
वसंत पंचमी 2026: तारीख और समय (नई दिल्ली)
वसंत पंचमी 2026 शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 को है (नई दिल्ली)। 2026 में वसंत पंचमी 14 जनवरी को पड़ने वाले मकर संक्रांति के 9 दिन बाद और 15 फरवरी को पड़ने वाले महाशिवरात्रि से 23 दिन पहले है।
| तारीख | शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 |
|---|---|
| तिथि | माघ शुक्ल पंचमी |
| पंचमी तिथि | 23 जनवरी, 02:30 से 24 जनवरी, 01:47 तक |
| पूर्वाह्न | 23 जनवरी, 07:17 से 12:33 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
वसंत पंचमी: अर्थ, नियम और परंपराएँ
सरस्वती, वसंत और इस दिन का अर्थ
वसंत पंचमी सबसे पहले माँ सरस्वती का दिन है, जो ज्ञान, वाणी, संगीत और कलाओं की देवी हैं। उन्हें श्वेत वस्त्रों में, कमल या हंस पर बैठे और वीणा बजाते हुए दिखाया जाता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि रची तो वह मौन थी, तब सरस्वती वीणा लेकर प्रकट हुईं और संसार को स्वर और वाणी मिली। इसी कारण बहुत से लोग इसे सरस्वती का प्राकट्य दिवस मानते हैं, और विद्यार्थी, शिक्षक, संगीतकार और लेखक इसे अपना पर्व समझते हैं।
यह दिन अपने नाम वाली ऋतु के आने की सूचना भी देता है। उत्तर भारत के मैदानों में सरसों के खेत पीले हो जाते हैं, ठंड का ज़ोर घटने लगता है, और कपड़ों, पकवानों और फूलों में पीला रंग छा जाता है। कुछ परंपराओं में कामदेव और रति की पूजा भी होती है, क्योंकि पुराने काव्य में वसंत कामदेव का सखा है। ब्रज में होली से लगभग चालीस दिन पहले, इसी दिन से होली का लंबा उत्सव शुरू हो जाता है, और प्रयागराज के माघ मेले में यह एक प्रमुख स्नान पर्व भी है।
तिथि कैसे तय होती है: पूर्वाह्न में माघ शुक्ल पंचमी
वसंत पंचमी माघ महीने के शुक्ल पक्ष, यानी बढ़ते चंद्रमा वाले पखवाड़े, की पंचमी तिथि है। शुक्ल पक्ष का पर्व होने से उत्तर भारत के पूर्णिमांत और पश्चिम व दक्षिण के अमांत, दोनों पंचांगों में इसका महीना एक ही रहता है, इसलिए नाम को लेकर कोई भ्रम नहीं होता। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः जनवरी के अंत से फरवरी के मध्य के बीच आती है।
निर्णायक समय पूर्वाह्न है, यानी सूर्योदय से दोपहर तक का भाग, क्योंकि सरस्वती पूजा सुबह का अनुष्ठान है। पर्व उसी दिन मनाया जाता है जिस दिन इस अवधि में पंचमी विद्यमान हो। लेकिन तिथि किसी भी घड़ी शुरू हो सकती है, और कभी-कभी पंचमी एक दिन देर सुबह लगकर अगले दिन दोपहर से पहले खत्म हो जाती है, यानी दोनों दिनों के पूर्वाह्न को आंशिक रूप से ही छूती है। तब पंचांगकार अपने-अपने निर्णय-नियम लगाते हैं और कभी-कभी अलग दिन चुन लेते हैं, इसीलिए एक ही साल में “बसंत पंचमी कब है” के दो जवाब मिल सकते हैं। यहाँ दी गई तिथि और पूजा का समय नई दिल्ली के लिए पूर्वाह्न के नियम पर आधारित है।
सरस्वती पूजा विधि, क्रम से
सुबह जल्दी स्नान करके बहुत से लोग पीले या सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं। एक चौकी पर पीला या सफ़ेद कपड़ा बिछाकर माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र रखा जाता है, और अक्सर पास में आम के पत्तों से सजा जल भरा कलश भी। पहले गणेश जी का पूजन होता है, फिर देवी को चंदन, अक्षत, गेंदे जैसे पीले और सफ़ेद फूल, धूप, घी का दीपक, बेर समेत मौसमी फल और केसरिया भात, मीठे चावल या बूँदी जैसी पीली मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं।
विद्यार्थी अपनी किताबें और कलम, और संगीतकार अपने वाद्य, देवी के सामने रखते हैं ताकि विद्या के साधन भी आशीर्वाद पाएँ। परिवार “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” मंत्र या “या कुन्देन्दुतुषारहारधवला” से शुरू होने वाली वंदना का पाठ करते हैं और आरती से पूजा पूरी होती है। बंगाल में सुबह का मुख्य अनुष्ठान पुष्पांजलि है, और बहुत से विद्यार्थी उसके बाद ही कुछ खाते हैं।
छोटे बच्चों के लिए यह विद्यारंभ का सबसे प्रिय दिन है। माता-पिता या गुरु बच्चे का हाथ पकड़कर तख्ती पर या थाली में फैले चावल पर पहले अक्षर लिखवाते हैं, अक्सर “ॐ” या वर्णमाला के शुरुआती अक्षर। तेलुगु परिवार इसे अक्षराभ्यासम कहते हैं, और तेलंगाना के बासर के ज्ञान सरस्वती मंदिर में इसके लिए लंबी कतारें लगती हैं।
क्या करें, किन बातों से बचें
परंपरा में यह दिन पीले और सफ़ेद रंग का है: वस्त्र, फूल, केसर या हल्दी से रंगे चावल और मिठाइयाँ, सब इसी रंग में। बहुत से परिवार भोजन सात्विक रखते हैं, गुरुजनों का सम्मान करते हैं और ज़रूरतमंद बच्चों को कलम, किताबें या पढ़ाई का सामान देते हैं। सरस्वती वाणी की देवी हैं, इसलिए इस दिन कटु या झूठे वचन से बचने का प्रयास किया जाता है।
बहुत से बंगाली घरों में किताबें पूरे दिन देवी के पास रहती हैं और कोई पढ़ाई नहीं करता; साल का यही एक दिन है जब किताब न खोलना भी भक्ति माना जाता है। कई बंगाली विद्यार्थी सरस्वती पूजा से पहले कुल, यानी बेर, नहीं खाते, ताकि मौसम का फल पहले देवी तक पहुँचे। लोक मान्यता में यह दिन अबूझ मुहूर्त है, यानी विवाह, गृह प्रवेश या नए काम के लिए अलग से मुहूर्त देखने की ज़रूरत नहीं मानी जाती, फिर भी सावधान परिवार पंचांग देख लेते हैं।
देश भर में बसंत के रंग
बंगाल, बिहार और ओडिशा में मोहल्ले-मोहल्ले में सरस्वती पूजा के पंडाल लगते हैं, और लगभग हर विद्यालय और महाविद्यालय में विद्यार्थी स्वयं प्रतिमा सजाते हैं और प्रसाद में खिचड़ी बँटती है। बंगाल में बच्चे के पहले अक्षर लिखने की रस्म को हाते खड़ी कहा जाता है, और पूजा के बाद प्रतिमा का नदी या तालाब में विसर्जन होता है।
पंजाब में बसंत पतंगबाज़ी और पीले कपड़ों का त्योहार है। दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सूफ़ी बसंत मनाया जाता है, जहाँ क़व्वाल गाते हैं और श्रद्धालु पीले फूल लेकर पहुँचते हैं; यह परंपरा कवि अमीर ख़ुसरो से जोड़ी जाती है। ब्रज में इसी दिन उस जगह होली का डाँडा गाड़ा जाता है जहाँ कुछ हफ़्ते बाद होलिका दहन होगा, और उत्तर प्रदेश व बिहार में खिली सरसों दूर-दूर तक खेतों को पर्व के रंग में रंग देती है।
वसंत पंचमी का ज्योतिषीय पक्ष
पंचमी पूर्णा तिथियों में गिनी जाती है, जिनमें दशमी और पूर्णिमा भी आती हैं, और मुहूर्त चिंतामणि जैसे ग्रंथों में इसके देवता नाग बताए गए हैं। वसंत पंचमी पर चंद्रमा सूर्य से 48 से 60 अंश आगे होता है, यानी सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आकाश में बढ़ता हुआ हँसिया-सा चाँद दिखता है, और वह प्रायः कुंभ या मीन राशि में होता है।
सूर्य प्रायः मकर राशि में होते हैं, कभी-कभी कुंभ में प्रवेश कर चुके होते हैं। छह ऋतुओं वाली शास्त्रीय गणना में माघ और फाल्गुन शिशिर ऋतु के महीने हैं और वसंत ऋतु चैत्र-वैशाख में आती है, इसलिए यह पर्व वसंत की शुरुआत नहीं, उसके आगमन की घोषणा है। ज्योतिष में विद्या का कारक गुरु और वाणी का कारक बुध माना गया है, और बहुत से लोग पढ़ाई, संगीत या लेखन की शुरुआत के लिए यही दिन चुनते हैं। लोक में इसे अबूझ मुहूर्त कहा जाता है, हालाँकि यह शास्त्रों के साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में शामिल नहीं है।
इस सप्ताह और क्या है
इन सात दिनों में कोई और व्रत या त्योहार नहीं है।
जनवरी 2026 के और व्रत-त्योहार
- शनिवार, 3 जनवरी — पौष पूर्णिमा
- बुधवार, 14 जनवरी — मकर संक्रांति
- बुधवार, 14 जनवरी — षटतिला एकादशी
- रविवार, 18 जनवरी — माघ अमावस्या
- गुरुवार, 29 जनवरी — जया एकादशी
वसंत पंचमी 2026: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वसंत पंचमी 2026 कब है और सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
वसंत पंचमी 2026 शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 को है (नई दिल्ली)। वसंत पंचमी माघ शुक्ल की वह पंचमी है जो पूर्वाह्न में विद्यमान हो, और पूजा दोपहर से पहले की जाती है। नई दिल्ली के लिए 2026 की तिथि, पंचमी के आरंभ और समाप्ति का समय और पूजा मुहूर्त पृष्ठ के ऊपरी हिस्से में देखें।
कुछ पंचांगों में बसंत पंचमी 2026 की तारीख अलग क्यों होती है?
पंचमी शायद ही कभी ठीक सूर्योदय पर शुरू होती है, इसलिए वह दो दिनों के पूर्वाह्न को आंशिक रूप से छू सकती है। ऐसे में पंचांगकार अलग-अलग निर्णय-नियम अपनाते हैं; अपने परिवार या मंदिर का पंचांग मानें।
बसंत पंचमी पर पीले कपड़े क्यों पहने जाते हैं?
पीला रंग पकती सरसों और आने वाले वसंत का रंग है, इसलिए वस्त्र, फूल और मिठाइयाँ इसी रंग में होती हैं। माँ सरस्वती का अपना रंग सफ़ेद भी इस दिन पसंद किया जाता है।
क्या वसंत पंचमी 2026 शादी के लिए अबूझ मुहूर्त है?
कई समुदाय इसे स्वयंसिद्ध दिन मानकर बिना अलग मुहूर्त के विवाह करते हैं। शास्त्रीय रूप से यह साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में नहीं है, इसलिए बहुत से परिवार फिर भी पंचांग देखते हैं।
क्या वसंत ऋतु सच में वसंत पंचमी से शुरू होती है?
पूरी तरह नहीं। छह ऋतुओं की गणना में माघ शिशिर ऋतु में आता है और वसंत ऋतु चैत्र-वैशाख में। यह पर्व आने वाले वसंत का स्वागत है।
विद्यारंभ क्या है और यह वसंत पंचमी पर क्यों किया जाता है?
विद्यारंभ बच्चे की पढ़ाई की औपचारिक शुरुआत है, जिसमें माता-पिता या गुरु उससे पहले अक्षर लिखवाते हैं। सरस्वती का दिन होने के कारण परिवार इसके लिए वसंत पंचमी चुनते हैं।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- वसंत पंचमी 2027 — गुरुवार, 11 फरवरी 2027
- पिछला त्योहार: मकर संक्रांति 2026 — 14 जनवरी
- अगला त्योहार: महाशिवरात्रि 2026 — 15 फरवरी
- 2026 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2026 का त्योहार कैलेंडर
- बुधवार, 14 जनवरी — मकर संक्रांति
- शुक्रवार, 23 जनवरी — वसंत पंचमी
- रविवार, 15 फरवरी — महाशिवरात्रि
- मंगलवार, 3 मार्च — होलिका दहन
- बुधवार, 4 मार्च — होली
- गुरुवार, 19 मार्च — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 26 मार्च — राम नवमी
- गुरुवार, 2 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 19 अप्रैल — अक्षय तृतीया
- बुधवार, 29 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- सोमवार, 17 अगस्त — नाग पंचमी
- शुक्रवार, 28 अगस्त — रक्षा बंधन
- शुक्रवार, 4 सितंबर — कृष्ण जन्माष्टमी
- सोमवार, 14 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- रविवार, 27 सितंबर — पितृ पक्ष
- शनिवार, 10 अक्टूबर — सर्व पितृ अमावस्या
- रविवार, 11 अक्टूबर — शारदीय नवरात्रि
- मंगलवार, 20 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- गुरुवार, 29 अक्टूबर — करवा चौथ
- शुक्रवार, 6 नवंबर — धनतेरस
- रविवार, 8 नवंबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- रविवार, 8 नवंबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- मंगलवार, 10 नवंबर — गोवर्धन पूजा
- बुधवार, 11 नवंबर — भाई दूज
- रविवार, 15 नवंबर — छठ पूजा
- शुक्रवार, 20 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- मंगलवार, 24 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा