कृष्ण जन्माष्टमी 2026: तिथि, निशीथ पूजा और महत्व
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है, और श्रीमद्भागवत के अनुसार उनका जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को हुआ था, जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में था। यहाँ नई दिल्ली के लिए गणना की गई 2026 की तिथि और निशीथ काल के साथ जानिए कि यह दिन कैसे तय होता है, व्रत और पूजा कैसे की जाती है और देश भर में यह पर्व किन रूपों में मनाया जाता है।
कृष्ण जन्माष्टमी 2026: तारीख और समय (नई दिल्ली)
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को है (नई दिल्ली)। 2026 में कृष्ण जन्माष्टमी 28 अगस्त को पड़ने वाले रक्षा बंधन के 7 दिन बाद और 14 सितंबर को पड़ने वाले गणेश चतुर्थी से 10 दिन पहले है।
| तारीख | शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 |
|---|---|
| तिथि | भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (अमांत पंचांग में श्रावण) |
| अष्टमी तिथि | 4 सितंबर, 02:27 से 5 सितंबर, 00:15 तक |
| निशीथ काल | 4 सितंबर, 23:57 से 5 सितंबर, 00:43 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
कृष्ण जन्माष्टमी: अर्थ, नियम और परंपराएँ
श्रीकृष्ण जन्म की कथा
भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के जन्म का यह पर्व गोकुलाष्टमी और कृष्ण जयंती के नाम से भी जाना जाता है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में कथा आती है कि मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने आकाशवाणी सुनी कि देवकी की आठवीं संतान उसका काल बनेगी। डरे हुए कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला।
उसी कारागार में आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। मान्यता है कि उस क्षण पहरेदार गहरी नींद में सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और फाटक अपने आप खुल गए। वसुदेव नवजात शिशु को टोकरी में रखकर मूसलाधार बारिश में उफनती यमुना पार करके गोकुल पहुँचे, बालक को नंद बाबा की पत्नी यशोदा के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर लौट आए। कंस ने जब उस कन्या को मारना चाहा तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में योगमाया के रूप में प्रकट हुई और बोली कि तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है।
अगली सुबह नंद के घर बेटा होने की खबर से पूरा गोकुल झूम उठा, और उसी आनंद की याद में जन्माष्टमी के अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। यह पर्व स्मार्त गृहस्थों और वैष्णव संप्रदायों, दोनों का है, और रात भर गाए जाने वाले भजनों में माखनचोर और मुरलीधर बालकृष्ण की लीलाएँ गूँजती रहती हैं।
जन्माष्टमी की तिथि कैसे निकाली जाती है
जन्माष्टमी कृष्ण पक्ष, यानी घटते चंद्रमा वाले पखवाड़े, की अष्टमी तिथि से जुड़ी है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ इसे भाद्रपद कृष्ण अष्टमी कहा जाता है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर पूरा होता है, इसलिए वहाँ यही अष्टमी श्रावण कृष्ण अष्टमी कहलाती है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः अगस्त या सितंबर की शुरुआत में पड़ती है।
श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, इसलिए निर्णायक समय निशीथ काल है, यानी स्थानीय मध्यरात्रि के आसपास का लगभग अड़तालीस मिनट का मुहूर्त। जिस रात निशीथ काल में अष्टमी विद्यमान हो, उसी रात जन्मोत्सव मनाया जाता है। अगर उसी घड़ी चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में भी हो तो इस मेल को जयंती कहते हैं और इसे विशेष पुण्यदायी माना जाता है। लेकिन तिथि और नक्षत्र अलग-अलग गति से बदलते हैं, इसलिए अष्टमी और रोहिणी का मेल कई बार घंटों या पूरे एक दिन से चूक जाता है।
यही कारण है कि बहुत से पंचांगों में जन्माष्टमी दो दिन छपी मिलती है। स्मार्त गृहस्थ सामान्यतः निशीथ काल वाली अष्टमी मानते हैं, भले ही उस दिन की शुरुआत सप्तमी में हुई हो। अनेक वैष्णव संप्रदाय सप्तमी से मिली (सप्तमी-विद्धा) अष्टमी को छोड़कर वह अष्टमी मानते हैं जो सूर्योदय के समय हो, और यह अक्सर अगला दिन होता है। ऐसे वर्ष में “जन्माष्टमी कब है” खोजने वालों को दोनों तारीखें मिलती हैं, और दोनों अपनी-अपनी परंपरा में सही होती हैं। इस पृष्ठ की तिथि और मध्यरात्रि का समय नई दिल्ली के लिए निकाला गया है; आपके मंदिर या कुल का पंचांग अलग हो तो उसी का पालन करें।
जन्माष्टमी व्रत और पूजा विधि
सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। कुछ भक्त निर्जल व्रत रखते हैं, यानी पानी भी नहीं पीते, जबकि अधिकतर लोग फलाहार करते हैं और फल, दूध, मखाने तथा कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन लेते हैं, अन्न नहीं। बुज़ुर्गों, बीमारों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए परंपरा हल्का व्रत रखने की छूट देती है।
घर के मंदिर को किसी नवजात के कमरे की तरह सजाया जाता है। फूलों और रंगीन कपड़ों से झूला या पालना सजता है, और लड्डू गोपाल के लिए नए वस्त्र, नन्हा मुकुट, बाँसुरी और मोरपंख तैयार रखे जाते हैं। शाम भजन-कीर्तन और जन्म प्रसंग के पाठ में बीतती है। ठीक आधी रात को शंख और घंटियाँ बजाकर जन्म की घोषणा होती है। फिर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से अभिषेक किया जाता है और उसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। ठाकुर जी को नए वस्त्र पहनाकर चंदन का तिलक लगाया जाता है, तुलसी दल अर्पित किया जाता है, और पालने में विराजमान करके धीरे-धीरे झुलाते हुए आरती गाई जाती है।
भोग में माखन-मिश्री, फल और धनिया पंजीरी रखी जाती है, जो भुने हुए धनिये के चूर्ण में चीनी मिलाकर बनती है। अभिषेक का पंचामृत प्रसाद के रूप में बँटता है, और बड़े मंदिरों में छप्पन भोग लगाया जाता है। पारण, यानी व्रत खोलने का समय, कुल की परंपरा पर निर्भर करता है: कुछ लोग आधी रात की पूजा के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोल लेते हैं, तो कुछ अगले दिन अष्टमी और रोहिणी दोनों समाप्त होने के बाद पारण करते हैं।
जन्माष्टमी पर क्या करें, क्या न करें
परंपरा के अनुसार शाम से पहले मंदिर की सजावट पूरी कर ली जाती है और भक्त आधी रात के जन्म तक जागते हैं; बहुत से लोग कीर्तन करते हुए सुबह तक जागरण करते हैं। प्रसाद ताज़ा बनाया जाता है और भोग लगने से पहले उसे कोई नहीं चखता। गोपाल कृष्ण की याद में कई परिवार गायों को चारा खिलाते हैं और ज़रूरतमंदों को भोजन या कपड़े देते हैं।
बहुत से घरों में इस दिन प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा रसोई से दूर रखे जाते हैं, और व्रत रखने वाले अनाज तथा दालें नहीं खाते। झगड़े और कड़वे बोल से बचा जाता है, क्योंकि घर में एक शिशु का स्वागत हो रहा होता है। कड़ा व्रत रखने वाला कोई अस्वस्थ महसूस करे तो परंपरा में उसके लिए फल या दूध ले लेना स्वीकार्य माना गया है। जहाँ दही हांडी के लिए मानव पिरामिड बनते हैं, वहाँ अब हेलमेट और सुरक्षा गद्दे भी इस रिवाज़ का हिस्सा बन चुके हैं।
देश भर में जन्माष्टमी के रंग
मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि और बचपन की लीलाओं की भूमि वृंदावन में इस दिन अपार भीड़ उमड़ती है। मंदिरों में कृष्ण के जीवन प्रसंगों की झाँकियाँ सजती हैं और रासलीला का मंचन होता है। वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में मंगला आरती साल में केवल एक बार, जन्माष्टमी की रात को होती है। गुजरात की द्वारका नगरी, जहाँ कृष्ण ने आगे चलकर राज किया, आधी रात का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाती है।
महाराष्ट्र में अगले दिन गोपालकाला होता है, जिसकी पहचान दही हांडी है। गोविंदाओं की टोलियाँ एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊँचाई पर टँगी दही की मटकी फोड़ती हैं, ठीक वैसे ही जैसे बालकृष्ण सखाओं के साथ माखन की मटकियाँ फोड़ते थे। कर्नाटक में उडुपी का कृष्ण मंदिर इस पर्व का बड़ा केंद्र है। केरल में अष्टमी रोहिणी वहाँ के सौर मास चिंगम और रोहिणी नक्षत्र के आधार पर मनाई जाती है, इसलिए उसकी तारीख उत्तर भारत से अलग हो सकती है, और गुरुवायूर मंदिर उत्सव का केंद्र रहता है।
तमिलनाडु में गोकुलाष्टमी या कृष्ण जयंती पर घर के द्वार से पूजा कक्ष तक नन्हे पैरों के निशान बनाए जाते हैं, मानो बालकृष्ण खुद ठुमकते हुए घर में आए हों, और सीडै तथा मुरुक्कु का भोग लगता है। बंगाल में इसी मौसम में पकने वाले ताड़ के फल से मिठाइयाँ बनती हैं, और अपने वैष्णव रास नृत्य के लिए प्रसिद्ध मणिपुर मंदिरों में पूजा और भक्ति नृत्य के साथ यह दिन मनाता है। नेपाल और विदेशों में बसे हिंदू परिवार भी आधी रात तक जागकर जन्मोत्सव मनाते हैं।
रोहिणी, उच्च का चंद्रमा और ज्योतिषीय पक्ष
कृष्ण अष्टमी वह अवधि है जब चंद्रमा सूर्य से 84 से 96 अंश पीछे रहता है। इस समय चंद्रमा का आधा भाग प्रकाशित दिखता है और ऐसा चंद्रमा लगभग आधी रात को उदय होता है, यानी कृष्ण जन्म की घड़ी के आसपास। अष्टमी जया वर्ग की तिथि है और मुहूर्त चिंतामणि की सूची में इसके देवता रुद्र रूप में शिव हैं।
रोहिणी नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है और यह पूरा का पूरा वृषभ राशि में पड़ता है, जो चंद्रमा की उच्च राशि है। इसलिए इस रात रोहिणी में स्थित चंद्रमा शास्त्रीय दृष्टि से अपनी सबसे अच्छी अवस्था में माना जाता है। इस ऋतु में सूर्य प्रायः अपनी स्वराशि सिंह में रहते हैं, और सूर्य-चंद्रमा दोनों के इस तरह बलवान होने को ज्योतिषी किसी दिव्य राजा के जन्म के अनुरूप मानते हैं।
रोहिणी के देवता सृष्टि रचने वाले प्रजापति माने जाते हैं, जो जन्मोत्सव के लिए सार्थक संगति है। शुभ कामों में वर्जित भद्रा, यानी विष्टि करण, कृष्ण पक्ष की अष्टमी में कभी नहीं पड़ती, इसलिए जन्माष्टमी का दिन तय करने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। हर वर्ष जो बात बदलती है वह यह है कि आधी रात तक चंद्रमा रोहिणी में पहुँचा या नहीं, और इसीलिए कई पंचांग जयंती योग वाली रात का अलग से उल्लेख करते हैं।
इस सप्ताह और क्या है
- सोमवार, 7 सितंबर — अजा एकादशी
सितंबर 2026 के और व्रत-त्योहार
- शुक्रवार, 11 सितंबर — भाद्रपद अमावस्या
- सोमवार, 14 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- गुरुवार, 17 सितंबर — कन्या संक्रांति
- मंगलवार, 22 सितंबर — परिवर्तिनी एकादशी
- शनिवार, 26 सितंबर — भाद्रपद पूर्णिमा
- रविवार, 27 सितंबर — पितृ पक्ष
कृष्ण जन्माष्टमी 2026: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जन्माष्टमी 2026 कब है और निशीथ पूजा का समय क्या है?
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को है (नई दिल्ली)। जन्माष्टमी उस रात मनाई जाती है जब कृष्ण पक्ष की अष्टमी निशीथ काल, यानी मध्यरात्रि के मुहूर्त, में विद्यमान हो। नई दिल्ली के लिए 2026 की तिथि और निशीथ पूजा का समय इस पृष्ठ के तिथि वाले हिस्से में दिया गया है।
स्मार्त और वैष्णव पंचांगों में जन्माष्टमी 2026 अलग-अलग दिन क्यों हो सकती है?
स्मार्त परंपरा आधी रात की अष्टमी को मानती है, चाहे उस दिन की शुरुआत सप्तमी में हुई हो, जबकि अनेक वैष्णव परंपराएँ सप्तमी से मिली अष्टमी को टालकर सूर्योदय वाली अष्टमी मानती हैं। जब तिथि दो दिनों में बँटी हो तो ये दोनों नियम अलग-अलग तारीखें बताते हैं।
जन्माष्टमी व्रत का पारण कब किया जाता है?
इसमें रिवाज़ अलग-अलग हैं। कुछ परिवार आधी रात की पूजा के बाद प्रसाद लेकर व्रत खोल लेते हैं, जबकि कुछ अगले दिन अष्टमी और रोहिणी दोनों के समाप्त होने के बाद पारण करते हैं। अपने परिवार या मंदिर की परंपरा का पालन करें।
जन्माष्टमी पर जयंती योग किसे कहते हैं?
आधी रात के समय कृष्ण अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र के एक साथ होने को जयंती योग कहते हैं, जो श्रीमद्भागवत में बताया गया कृष्ण जन्म का संयोग है। यह हर वर्ष नहीं बनता, और जब बनता है तब उस रात को विशेष पवित्र माना जाता है।
दही हांडी 2026 जन्माष्टमी के दिन होगी या अगले दिन?
दही हांडी गोपालकाला का हिस्सा है, जो महाराष्ट्र में सामान्यतः आधी रात के जन्मोत्सव के अगले दिन मनाया जाता है। स्थानीय मंडल अपने आयोजन का समय खुद घोषित करते हैं।
क्या जन्माष्टमी 2026 का निशीथ मुहूर्त हर शहर में एक जैसा होगा?
नहीं। निशीथ काल स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय से गिना जाता है, इसलिए घड़ी के हिसाब से इसका समय शहर के देशांतर और अक्षांश के साथ बदलता है। यहाँ दिया गया समय नई दिल्ली का है; अपने शहर के लिए वहाँ का पंचांग देखें।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- कृष्ण जन्माष्टमी 2027 — बुधवार, 25 अगस्त 2027
- पिछला त्योहार: रक्षा बंधन 2026 — 28 अगस्त
- अगला त्योहार: गणेश चतुर्थी 2026 — 14 सितंबर
- 2026 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2026 का त्योहार कैलेंडर
- बुधवार, 14 जनवरी — मकर संक्रांति
- शुक्रवार, 23 जनवरी — वसंत पंचमी
- रविवार, 15 फरवरी — महाशिवरात्रि
- मंगलवार, 3 मार्च — होलिका दहन
- बुधवार, 4 मार्च — होली
- गुरुवार, 19 मार्च — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 26 मार्च — राम नवमी
- गुरुवार, 2 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 19 अप्रैल — अक्षय तृतीया
- बुधवार, 29 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- सोमवार, 17 अगस्त — नाग पंचमी
- शुक्रवार, 28 अगस्त — रक्षा बंधन
- शुक्रवार, 4 सितंबर — कृष्ण जन्माष्टमी
- सोमवार, 14 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- रविवार, 27 सितंबर — पितृ पक्ष
- शनिवार, 10 अक्टूबर — सर्व पितृ अमावस्या
- रविवार, 11 अक्टूबर — शारदीय नवरात्रि
- मंगलवार, 20 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- गुरुवार, 29 अक्टूबर — करवा चौथ
- शुक्रवार, 6 नवंबर — धनतेरस
- रविवार, 8 नवंबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- रविवार, 8 नवंबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- मंगलवार, 10 नवंबर — गोवर्धन पूजा
- बुधवार, 11 नवंबर — भाई दूज
- रविवार, 15 नवंबर — छठ पूजा
- शुक्रवार, 20 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- मंगलवार, 24 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा