महाशिवरात्रि 2026: तिथि, चार प्रहर की पूजा और रात्रि जागरण
महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की वह रात है जब शिव भक्त उपवास रखकर पूरी रात पूजा और जागरण करते हैं। यहाँ इसकी कथाएँ, आधी रात वाले नियम से तिथि तय होने का तरीका और चार प्रहर की पूजा विधि दी गई है, और 2026 की तिथि तथा निशीथ काल का समय नई दिल्ली के अनुसार निकाला गया है।
महाशिवरात्रि 2026: तारीख और समय (नई दिल्ली)
महाशिवरात्रि 2026 रविवार, 15 फरवरी 2026 को है (नई दिल्ली)। 2026 में महाशिवरात्रि 23 जनवरी को पड़ने वाले वसंत पंचमी के 23 दिन बाद और 3 मार्च को पड़ने वाले होलिका दहन से 16 दिन पहले है।
| तारीख | रविवार, 15 फरवरी 2026 |
|---|---|
| तिथि | फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (अमांत पंचांग में माघ) |
| चतुर्दशी तिथि | 15 फरवरी, 17:06 से 16 फरवरी, 17:35 तक |
| निशीथ काल | 16 फरवरी, 00:09 से 01:01 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
महाशिवरात्रि: अर्थ, नियम और परंपराएँ
शिव की महारात्रि क्यों मनाई जाती है
हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि होती है, पर जाड़े के अंत में आने वाली शिवरात्रि महाशिवरात्रि कहलाती है। इससे जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा लिंगोद्भव की है। ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद चल रहा था, तभी उनके बीच अग्नि का एक अनंत स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा हंस बनकर उसका ऊपरी छोर खोजने उड़े और विष्णु वराह बनकर नीचे की ओर खोदते गए, पर कोई भी उसका अंत न पा सका। तब उसी स्तंभ से शिव प्रकट हुए, और शिवलिंग को उसी अनंत रूप के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
बहुत से परिवार इस रात को शिव और पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाते हैं। शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है, जो जंगली जानवरों के डर से रात भर बेल के पेड़ पर बैठा रहा और नींद भगाने के लिए पत्ते तोड़-तोड़कर नीचे गिराता रहा। नीचे एक शिवलिंग था जिसका उसे पता भी नहीं था, और पत्तों के साथ पानी की बूँदें भी उस पर गिरती रहीं। कहा जाता है कि इसी अनजानी पूजा से उसे शिव की कृपा मिली। कुछ परंपराएँ इस रात को समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष से भी जोड़ती हैं, जिसे पीकर शिव का कंठ नीला हुआ और वे नीलकंठ कहलाए।
तिथि का नियम: आधी रात की चतुर्दशी
महाशिवरात्रि कृष्ण पक्ष, यानी घटते चंद्रमा वाले पखवाड़े, की चतुर्दशी है, जो अमावस्या से ठीक पहले आती है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग, जिनमें महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है, इसे फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कहते हैं, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के अमांत पंचांग इसी रात को माघ कृष्ण चतुर्दशी लिखते हैं। दोनों नाम एक ही रात के हैं, जो प्रायः फरवरी या मार्च की शुरुआत में पड़ती है।
निर्णायक समय निशीथ काल है, यानी स्थानीय आधी रात के आसपास का लगभग 48 मिनट का मुहूर्त, क्योंकि मुख्य पूजा इसी समय होती है। पर्व उस दिन मनाया जाता है जिसकी रात में निशीथ काल के समय चतुर्दशी चल रही हो। तिथि किसी भी घड़ी शुरू हो सकती है, इसलिए कभी चतुर्दशी दो रातों के निशीथ को छू लेती है और कभी किसी को भी पूरा नहीं ढकती। तब पंचांगकार निर्णय-नियम लगाते हैं, जिनसे हमेशा एक ही उत्तर नहीं निकलता, और यही वजह है कि कुछ वर्षों में “महाशिवरात्रि कब है” के दो जवाब दिखते हैं। इस पृष्ठ पर तिथि और निशीथ काल का समय नई दिल्ली के लिए इसी नियम से दिया गया है।
रात को चार प्रहरों में बाँटा जाता है, जो सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक के चार बराबर हिस्से हैं, और बहुत से भक्त हर प्रहर में अलग पूजा करते हैं। व्रत का पारण अगली सुबह स्थानीय पंचांग में दिए समय के भीतर होता है।
पूजा विधि: व्रत, अभिषेक और चार प्रहर
दिन की शुरुआत स्नान और संकल्प से होती है, जिसमें व्रत और जागरण का निश्चय किया जाता है। कुछ भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, यानी पानी तक नहीं लेते, जबकि बहुत से लोग फल, दूध और व्रत में चलने वाली चीज़ों का फलाहार करते हैं। बुज़ुर्गों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं के लिए परंपरा हल्का व्रत रखने की छूट देती है। शाम को दोबारा स्नान करके घर या मंदिर में पूजा शुरू होती है।
शिवलिंग का अभिषेक इस पूजा का केंद्र है। पहले जल या गंगाजल चढ़ाया जाता है, फिर दूध, दही, घी और शहद, और एक व्यापक परंपरा में इन चारों को रात के चार प्रहरों में एक-एक करके अर्पित किया जाता है। इसके बाद शिवलिंग को पोंछकर उस पर चंदन और भस्म लगाई जाती है, और बेलपत्र, धतूरे के फूल और फल, सफ़ेद फूल, अक्षत और दीपक अर्पित किए जाते हैं। भक्त “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हैं, महामृत्युंजय मंत्र पढ़ते हैं या वैदिक मंत्रों के साथ रुद्राभिषेक करवाते हैं, और बहुत से लोग रुद्राक्ष धारण करते या चढ़ाते हैं।
पूरी रात जागना, यानी जागरण, इस पर्व का अहम हिस्सा है: मंदिरों में भोर तक भजन-कीर्तन और शिव पुराण की कथा चलती है। अगली सुबह स्नान और अंतिम पूजा के बाद पारण काल में व्रत खोला जाता है।
क्या करें, किन बातों से बचें
व्रत रखने वाले परंपरागत रूप से अन्न, दालें, प्याज़ और लहसुन नहीं लेते, और बहुत से घरों में पूरा दिन सात्विक रहता है। जागरण की रात मनोरंजन में नहीं, प्रार्थना, जप या शांत चिंतन में बिताई जाती है, और क्रोध तथा कटु वचन से दूर रहा जाता है। बेलपत्र साबुत चढ़ाए जाते हैं, जिनकी तीनों पत्तियाँ आपस में जुड़ी हों।
दो चीज़ें परंपरा से शिव को नहीं चढ़ाई जातीं। केतकी का फूल इसलिए वर्जित है कि लिंगोद्भव कथा में उसने झूठी गवाही दी थी कि ब्रह्मा ने स्तंभ का ऊपरी छोर पा लिया है, और विष्णु को प्रिय तुलसी शिवलिंग पर नहीं रखी जाती। बहुत से भक्त शिवलिंग की पूरी परिक्रमा भी नहीं करते, बल्कि अभिषेक का जल बहाने वाली जलहरी की नाली तक जाकर लौट आते हैं, क्योंकि उसे लाँघना उचित नहीं माना जाता।
देश-विदेश में महाशिवरात्रि
कश्मीरी पंडित इसे हेरथ के रूप में मनाते हैं, जो त्रयोदशी को, यानी देश के अधिकांश हिस्सों से एक दिन पहले, होता है। इसमें पानी भरे घड़ों में अखरोट भिगोकर उनकी पूजा की जाती है और बाद में वही अखरोट प्रसाद के रूप में बाँटे जाते हैं। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि से पहले नौ दिन की शिव नवरात्रि मनाई जाती है, और हिमाचल प्रदेश के मंडी में सप्ताह भर का शिवरात्रि मेला लगता है, जिसमें आसपास के गाँवों के देवता शोभायात्रा में लाए जाते हैं।
गुजरात में जूनागढ़ के पास गिरनार पर्वत की तलहटी में भवनाथ का मेला लगता है, जहाँ साधु-संत जुटते हैं, और वाराणसी के काशी विश्वनाथ तथा आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम और श्रीकालहस्ती में रात भर भारी भीड़ रहती है। प्रयागराज के माघ मेले का यह अंतिम बड़ा स्नान पर्व भी है। सीमा के पार नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में भारत से भी तीर्थयात्री पहुँचते हैं, और मॉरीशस में हिंदू पैदल चलकर ग्रैंड बेसिन की ज्वालामुखी झील तक जाते हैं, जिसे गंगा तालाब कहा जाता है, और अभिषेक के लिए उसका जल लेकर लौटते हैं।
महाशिवरात्रि का ज्योतिषीय महत्व
मुहूर्त चिंतामणि जैसे शास्त्रीय ग्रंथ चतुर्दशी तिथि के देवता स्वयं शिव बताते हैं, इसीलिए हर कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि है। यह चतुर्थी और नवमी के साथ रिक्ता तिथियों में आती है, जिन्हें नए काम शुरू करने के लिए टाला जाता है, और यह बात आरंभ के बजाय उपवास और उपासना को समर्पित इस रात से मेल खाती है। इस रात चंद्रमा सूर्य से 12 से 24 अंश पीछे, पतली घटती कला के रूप में होता है, जो भोर से कुछ ही पहले उगता है और लगभग दिखाई नहीं देता।
सूर्य प्रायः कुंभ राशि में होते हैं और चंद्रमा मकर या कुंभ में, और ये दोनों राशियाँ अनुशासन और वैराग्य के ग्रह शनि की हैं। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है, और इस रात वह अपनी सबसे क्षीण अवस्था में, अमावस्या में विलीन होने के करीब होता है। इसलिए उपवास और जागरण को उस रात मन पर विजय पाने की साधना माना जाता है जब मन का ग्रह सबसे दुर्बल है, और योगेश्वर शिव के पर्व के लिए यह भाव बिल्कुल उपयुक्त है।
इस सप्ताह और क्या है
- शुक्रवार, 13 फरवरी — कुंभ संक्रांति
- शुक्रवार, 13 फरवरी — विजया एकादशी
- मंगलवार, 17 फरवरी — फाल्गुन अमावस्या
फरवरी 2026 के और व्रत-त्योहार
- रविवार, 1 फरवरी — माघ पूर्णिमा
- शुक्रवार, 27 फरवरी — आमलकी एकादशी
महाशिवरात्रि 2026: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
महाशिवरात्रि 2026 कब है और निशीथ काल पूजा का समय क्या है?
महाशिवरात्रि 2026 रविवार, 15 फरवरी 2026 को है (नई दिल्ली)। महाशिवरात्रि कृष्ण पक्ष की वह चतुर्दशी है जो निशीथ काल, यानी आधी रात के मुहूर्त, में विद्यमान हो। 2026 की तिथि, चतुर्दशी के आरंभ और समाप्ति का समय और नई दिल्ली के लिए निशीथ काल का समय ऊपर समय वाले हिस्से में दिए गए हैं।
कुछ पंचांगों में महाशिवरात्रि 2026 की तारीख अलग क्यों दिखती है?
चतुर्दशी शायद ही कभी ठीक सूर्योदय पर शुरू होती है, इसलिए हो सकता है कि वह दो रातों के निशीथ को छू ले या किसी को भी पूरा न ढके। ऐसे में पंचांगकार निर्णय-नियम अलग ढंग से लगाते हैं; अपने परिवार या मंदिर का पंचांग मानें।
महाशिवरात्रि फाल्गुन में है या माघ में?
दोनों सही हैं। पूर्णिमांत पंचांग इसे फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कहते हैं और अमांत पंचांग माघ कृष्ण चतुर्दशी, पर रात एक ही है।
महाशिवरात्रि के व्रत में क्या खा सकते हैं?
व्रत रखने वाले परंपरागत रूप से अन्न और दालें नहीं लेते और फल, दूध, दही, मेवे तथा कुट्टू या सिंघाड़े का आटा लेते हैं, या निर्जला व्रत रखते हैं। बुज़ुर्गों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं के लिए हल्का व्रत परंपरा में मान्य है।
महाशिवरात्रि 2026 का व्रत कब खोलें?
पारण अगली सुबह स्नान और पूजा के बाद, स्थानीय पंचांग में दिए समय के भीतर किया जाता है। यह समय स्थानीय सूर्योदय के साथ बदलता है, इसलिए अपने शहर का पारण काल वहीं के पंचांग से देखें।
मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या अंतर है?
हर कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि होती है। फाल्गुन की, यानी अमांत गणना में माघ की, कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि है, जो साल की सबसे बड़ी शिवरात्रि मानी जाती है।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- महाशिवरात्रि 2027 — शनिवार, 6 मार्च 2027
- पिछला त्योहार: वसंत पंचमी 2026 — 23 जनवरी
- अगला त्योहार: होलिका दहन 2026 — 3 मार्च
- 2026 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2026 का त्योहार कैलेंडर
- बुधवार, 14 जनवरी — मकर संक्रांति
- शुक्रवार, 23 जनवरी — वसंत पंचमी
- रविवार, 15 फरवरी — महाशिवरात्रि
- मंगलवार, 3 मार्च — होलिका दहन
- बुधवार, 4 मार्च — होली
- गुरुवार, 19 मार्च — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 26 मार्च — राम नवमी
- गुरुवार, 2 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 19 अप्रैल — अक्षय तृतीया
- बुधवार, 29 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- सोमवार, 17 अगस्त — नाग पंचमी
- शुक्रवार, 28 अगस्त — रक्षा बंधन
- शुक्रवार, 4 सितंबर — कृष्ण जन्माष्टमी
- सोमवार, 14 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- रविवार, 27 सितंबर — पितृ पक्ष
- शनिवार, 10 अक्टूबर — सर्व पितृ अमावस्या
- रविवार, 11 अक्टूबर — शारदीय नवरात्रि
- मंगलवार, 20 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- गुरुवार, 29 अक्टूबर — करवा चौथ
- शुक्रवार, 6 नवंबर — धनतेरस
- रविवार, 8 नवंबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- रविवार, 8 नवंबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- मंगलवार, 10 नवंबर — गोवर्धन पूजा
- बुधवार, 11 नवंबर — भाई दूज
- रविवार, 15 नवंबर — छठ पूजा
- शुक्रवार, 20 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- मंगलवार, 24 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा