गुरु गोचर 2026: सिंह राशि में बृहस्पति
गुरु गोचर 2026, भारतीय मानक समय में: अपनी चंद्र राशि चुनें और देखें कि सिंह राशि में गुरु के 2026–2028 के दौर के हर पड़ाव में बृहस्पति उससे किस भाव में रहते हैं, और गोचर का शास्त्रीय अध्याय उस भाव के गुरु के बारे में क्या कहता है।
एक उदाहरण
उदाहरण कुंडली में चंद्रमा कुंभ राशि में है। कुंभ से गिनने पर सिंह सातवें स्थान पर आती है, जो गुरु के लिए ग्रंथ के शुभ भावों में से एक है; 2027 में कर्क में लौटने के दौरान गुरु छठे भाव में रहते हैं और कन्या वाले अंतराल में आठवें में। उदाहरण के नीचे यही गिनती सभी बारह चंद्र राशियों के लिए दी गई है।
कुंडली: 13 दिसंबर 1961, सुबह 05:30, चन्नरायपटना, भारत (लाहिड़ी अयनांश)
गुरु गोचर — कुंभ राशि में चंद्रमा
भाव कुंभ चंद्र राशि से गिने गए हैं; सिंह उससे सातवाँ भाव है।
| गुरु की राशि | कब से कब तक (IST) | चंद्र राशि से भाव | शास्त्रीय फल |
|---|---|---|---|
| सिंह | 31 अक्टूबर 2026, 11:17 IST से 25 जनवरी 2027, 00:56 IST तक | सातवाँ (शुभ भाव) | ग्रंथ चंद्रमा से सातवें भाव के गुरु को इनसे जोड़ता है: अच्छे उद्देश्य से यात्रा, जीवनसाथी के साथ सुख और संतान। वेध भाव: तीसरा, मेष। |
| कर्क | 25 जनवरी 2027, 00:56 IST से 26 जून 2027, 04:30 IST तक | छठा (शुभ सूची में नहीं) | ग्रंथ चंद्रमा से छठे भाव के गुरु को इनसे जोड़ता है: विरोधियों और संबंधियों से परेशानी, और अस्वस्थता। कर्क गुरु की उच्च राशि है: ग्रंथ के अनुसार यहाँ गुरु इस भाव के प्रतिकूल फल नहीं देते। |
| सिंह | 26 जून 2027, 04:30 IST से 26 नवंबर 2027, 17:58 IST तक | सातवाँ (शुभ भाव) | ग्रंथ चंद्रमा से सातवें भाव के गुरु को इनसे जोड़ता है: अच्छे उद्देश्य से यात्रा, जीवनसाथी के साथ सुख और संतान। वेध भाव: तीसरा, मेष। |
| कन्या | 26 नवंबर 2027, 17:58 IST से 28 फरवरी 2028, 18:40 IST तक | आठवाँ (शुभ सूची में नहीं) | ग्रंथ चंद्रमा से आठवें भाव के गुरु को इनसे जोड़ता है: थकाने वाली यात्राएँ, थकान और धन की हानि। कन्या गुरु के लिए शत्रु की राशि है: ग्रंथ के अनुसार इस भाव में गुरु के फल अधिक कठिन होते हैं। |
| सिंह | 28 फरवरी 2028, 18:40 IST से 24 जुलाई 2028, 14:47 IST तक | सातवाँ (शुभ भाव) | ग्रंथ चंद्रमा से सातवें भाव के गुरु को इनसे जोड़ता है: अच्छे उद्देश्य से यात्रा, जीवनसाथी के साथ सुख और संतान। वेध भाव: तीसरा, मेष। |
केवल संदर्भ के लिए। ये फल फलदीपिका में चंद्रमा से हर भाव के लिए बताए गए संबंध हैं, जिन्हें जन्म कुंडली और उस समय चल रही दशा के साथ पढ़ा जाता है। समय भारतीय मानक समय में, लाहिड़ी अयनांश से।
हर चंद्र राशि से गुरु का भाव
सिंह में पड़ाव 31 अक्टूबर 2026 से; कर्क 25 जनवरी 2027 – 26 जून 2027; कन्या 26 नवंबर 2027 – 28 फरवरी 2028।
| चंद्र राशि | गुरु सिंह में | कर्क में (2027) | कन्या में (2027–28) |
|---|---|---|---|
| मेष | पाँचवाँ, शुभ | चौथा | छठा |
| वृषभ | चौथा | तीसरा | पाँचवाँ, शुभ |
| मिथुन | तीसरा | दूसरा, शुभ | चौथा |
| कर्क | दूसरा, शुभ | पहला | तीसरा |
| सिंह | पहला | बारहवाँ | दूसरा, शुभ |
| कन्या | बारहवाँ | ग्यारहवाँ, शुभ | पहला |
| तुला | ग्यारहवाँ, शुभ | दसवाँ | बारहवाँ |
| वृश्चिक | दसवाँ | नौवाँ, शुभ | ग्यारहवाँ, शुभ |
| धनु | नौवाँ, शुभ | आठवाँ | दसवाँ |
| मकर | आठवाँ | सातवाँ, शुभ | नौवाँ, शुभ |
| कुंभ | सातवाँ, शुभ | छठा | आठवाँ |
| मीन | छठा | पाँचवाँ, शुभ | सातवाँ, शुभ |
इसी दौर के दूसरे धीमे गोचर (अंग्रेज़ी में): राहु-केतु गोचर 2026 · शनि गोचर 2027
गुरु ग्रह के कारकत्व, उच्च-नीच राशि और मित्र ग्रह: नवग्रह में गुरु
यह उदाहरण के लिए ली गई जन्म जानकारी है, ताकि परिणाम का रूप दिखाया जा सके। यह किसी ग्राहक की कुंडली नहीं है। ऊपर आप जो भी जन्म विवरण भरते हैं, वह न कहीं सहेजा जाता है, न किसी URL में डाला जाता है और न प्रकाशित होता है।
बृहस्पति, जिन्हें गुरु या देवगुरु भी कहा जाता है, 31 अक्टूबर 2026 को 11:17 बजे (भारतीय मानक समय) निरयण सिंह राशि में प्रवेश करते हैं; उससे पहले जून 2026 से वे कर्क राशि में थे। बृहस्पति का राशि परिवर्तन साल के सबसे अधिक देखे जाने वाले गोचरों में गिना जाता है, क्योंकि गुरु को पूरा राशिचक्र घूमने में लगभग बारह वर्ष लगते हैं, और वे जिस राशि में होते हैं, उसी से तय होता है कि लगभग एक वर्ष तक कुंडली का कौन-सा हिस्सा उनकी कृपा वाला माना जाए। इस बार का गोचर एक सीधा, साल भर का ठहराव नहीं है। 13 दिसंबर 2026 को गुरु सिंह में ही वक्री हो जाते हैं, 25 जनवरी 2027 को पीछे खिसककर कर्क में लौटते हैं, 26 जून 2027 को फिर सिंह में आते हैं, 26 नवंबर 2027 को कन्या में जाते हैं, और एक बार और सिंह में लौटकर 24 जुलाई 2028 को उसे अंतिम बार छोड़ते हैं। नीचे अपनी चंद्र राशि चुनें: पेज इन सभी पड़ावों की सूची देगा, हर पड़ाव में आपकी चंद्र राशि से गुरु किस भाव में हैं, और फलदीपिका का गोचर अध्याय उस भाव के गुरु को कैसे पढ़ता है। ये फल ग्रंथ के बताए हुए हैं और संदर्भ के लिए दिए गए हैं।
सिंह राशि का दौर: पाँच पड़ाव
पृथ्वी से देखने पर बृहस्पति हर साल लगभग चार महीने के लिए रुककर उलटी दिशा में चलते दिखते हैं — इसे वक्री होना कहते हैं। जब यह वक्री काल किसी राशि की सीमा के पास पड़ता है, तो गुरु एक ही सीमा को तीन बार पार कर सकते हैं, और यह दौर ऐसा ही है। सिंह में पहला पड़ाव 31 अक्टूबर 2026 से 25 जनवरी 2027 तक है। 13 दिसंबर 2026 को गुरु सिंह में रहते हुए ही वक्री होते हैं और 25 जनवरी 2027 को 00:56 बजे (भारतीय मानक समय) सीमा पार करके वापस कर्क में चले जाते हैं।
13 अप्रैल 2027 को वे कर्क में मार्गी होते हैं और 26 जून 2027 को 04:30 बजे (भारतीय मानक समय) फिर सिंह में प्रवेश करते हैं — यह पाँचों में सबसे लंबा पड़ाव है। 26 नवंबर 2027 को गुरु कन्या में जाते हैं, 12 जनवरी 2028 को वहीं वक्री होते हैं, और 28 फरवरी 2028 से फिर सिंह में होते हैं। 14 मई 2028 को वे सिंह में मार्गी होते हैं और 24 जुलाई 2028 को 14:47 बजे (भारतीय मानक समय) अंतिम बार कन्या में चले जाते हैं। पहले प्रवेश से अंतिम निकास तक यह दौर लगभग 21 महीनों का है, जिसमें से गुरु लगभग साढ़े 12 महीने स्वयं सिंह में रहते हैं।
अपनी चंद्र राशि से भाव कैसे गिनें
फलदीपिका का गोचर अध्याय आरंभ में ही कहता है कि सभी संदर्भ बिंदुओं में चंद्र राशि से गिनना सबसे उपयुक्त है, इसलिए गोचर फल जन्म के चंद्रमा से भाव गिनकर पढ़े जाते हैं, लग्न से नहीं। जिस राशि में आपका चंद्रमा है, वह पहला भाव है; सिंह उससे एक तय संख्या आगे पड़ती है। कुंभ चंद्र राशि के लिए सिंह सातवाँ भाव है, मेष के लिए पाँचवाँ, और सिंह चंद्र राशि के लिए पहला।
क्योंकि केवल चंद्र राशि चाहिए, एक ही राशि में चंद्रमा वाले सभी लोगों के लिए इस पेज के भाव और तारीखें एक जैसी हैं। जन्म समय का महत्व बस इतना है कि वह चंद्र राशि तय करता है — पर यह मायने रख सकता है: चंद्रमा लगभग सवा दो दिन में राशि बदलता है, अक्सर दिन के बीच में। अगर अपनी राशि पर पक्का भरोसा न हो, तो परिणाम पढ़ने से पहले चंद्र राशि कैलकुलेटर से उसे जाँच लें।
गुरु के शुभ भाव, और बाकी सात
अध्याय चंद्रमा से पाँच ऐसे भाव बताता है जिनमें गुरु का गोचर शुभ फल देता है: दूसरा, पाँचवाँ, सातवाँ, नौवाँ और ग्यारहवाँ। सिंह वाले पड़ावों में इससे पाँच चंद्र राशियाँ शुभ सूची में आती हैं — कर्क (सिंह उससे दूसरा), मेष (सिंह उससे पाँचवाँ), कुंभ (सिंह उससे सातवाँ), धनु (सिंह उससे नौवाँ) और तुला (सिंह उससे ग्यारहवाँ)। बाकी सात चंद्र राशियों के लिए गुरु पहले, तीसरे, चौथे, छठे, आठवें, दसवें या बारहवें भाव में होते हैं, जिन्हें ग्रंथ गुरु के शुभ स्थानों में नहीं गिनता।
हर भाव के लिए ग्रंथ फिर फलों की एक छोटी सूची देता है। नौवें भाव में वह हर ओर से समृद्धि और सौभाग्य की बात करता है, पाँचवें में संतान, सज्जनों की संगति और अधिकारियों की कृपा की, और दूसरे में धन लाभ, घर में सुख और प्रभाव की; आठवें में थकाने वाली यात्राएँ, थकान और धन की हानि की, और बारहवें में दुःख और संपत्ति को लेकर चिंता की। इस पेज की परिणाम तालिका आपके भाव की पंक्ति सरल शब्दों में देती है। हर पंक्ति उस स्थिति के लिए ग्रंथ का बताया हुआ संबंध है, किसी एक व्यक्ति के लिए भविष्यवाणी नहीं, और उसे जन्म कुंडली तथा उस समय चल रही दशा के साथ पढ़ा जाता है।
वेध: जब शुभ गोचर रुक जाता है
केवल शुभ भाव पूरा नियम नहीं है। फलदीपिका गुरु के हर शुभ भाव के साथ एक वेध, यानी बाधा, भाव जोड़ती है: दूसरे के साथ बारहवाँ, पाँचवें के साथ चौथा, सातवें के साथ तीसरा, नौवें के साथ दसवाँ और ग्यारहवें के साथ आठवाँ। गुरु शुभ भाव का फल तभी देते हैं जब उसी समय उसके वेध भाव से कोई ग्रह न गुज़र रहा हो।
उदाहरण के तौर पर, कुंभ चंद्र राशि के लिए सिंह के गुरु सातवें भाव में हैं, और उसका वेध भाव कुंभ से तीसरा, यानी मेष है। सिंह वाले पड़ावों में जब भी कोई दूसरा ग्रह मेष से गुज़रता है, ग्रंथ उतने समय के लिए सातवें भाव के शुभ फल को बाधित मानता है। तेज़ चलने वाले ग्रह कुछ हफ़्तों या महीनों में हर राशि से निकल जाते हैं, इसलिए गुरु के एक ही पड़ाव में वेध आता-जाता रहता है, जबकि शनि जैसा धीमा ग्रह किसी वेध भाव में लगभग पूरे पड़ाव तक रह सकता है; इस साइट का गोचर पेज बताता है कि जिस दिन आप देखें, उस दिन हर ग्रह कहाँ है।
सिंह, कर्क और कन्या: राशि का भी असर
यही अध्याय उस राशि को भी तौलता है जिससे गुरु गुज़र रहे हैं। सिंह सूर्य की राशि है, और सूर्य गुरु के नैसर्गिक मित्रों में हैं, इसलिए सिंह के तीनों पड़ावों में भाव के फल वैसे ही पढ़े जाते हैं जैसे दिए गए हैं। कर्क गुरु की उच्च राशि है, और ग्रंथ कहता है कि अपनी या उच्च राशि से गुज़रता ग्रह अशुभ भाव के प्रतिकूल फल नहीं देता, जबकि शुभ भाव में उसके अच्छे फल पूरे मिलते हैं। यह बात 25 जनवरी 2027 से 26 जून 2027 तक कर्क में लौटने के दौरान हर चंद्र राशि पर लागू होती है।
कन्या बुध की राशि है, और नैसर्गिक मैत्री में बुध गुरु के शत्रुओं में गिने जाते हैं। शुभ ग्रह के शत्रु की राशि में होने पर ग्रंथ कहता है कि उसकी अच्छा फल देने की शक्ति घट जाती है, और अशुभ भाव में उसके फल अधिक कठिन होते हैं। यह बात 26 नवंबर 2027 से 28 फरवरी 2028 तक के कन्या वाले अंतराल पर लागू होती है। सूर्य की किरणों में छिपे, यानी अस्त, ग्रह को भी ग्रंथ कमज़ोर मानता है, और हर साल सूर्य से युति के आसपास कुछ हफ़्ते गुरु के साथ ऐसा होता है। एक शर्त और है: गुरु राशि के मध्य भाग में रहते हुए अपना फल देते हैं, जबकि यहाँ की तारीखें केवल राशि परिवर्तन बताती हैं। परिणाम की हर पंक्ति बताती है कि राशि वाला कौन-सा नियम उस पर लागू होता है।
पंचांगों में तारीखें अलग क्यों दिख सकती हैं
इस पेज का हर समय लाहिड़ी अयनांश से निकाला गया है, जो इस साइट का मानक है, और भारतीय मानक समय में लिखा है। जो छपे पंचांग थोड़ा अलग अयनांश या गणना पद्धति अपनाते हैं, वे प्रवेश का क्षण घंटे भर आगे-पीछे दे सकते हैं; तारीख प्रायः वही रहती है। भारत के बाहर स्थानीय घड़ी से कोई प्रवेश पिछली तारीख पर भी पड़ सकता है: कर्क में वापसी 25 जनवरी 2027 को 00:56 बजे (भारतीय मानक समय) होती है, पर उस समय खाड़ी देशों और उनसे पश्चिम में स्थानीय तारीख 24 जनवरी 2027 ही होती है; 26 जून 2027 का पुनः प्रवेश उत्तर और दक्षिण अमेरिका में 25 जून 2027 को पड़ता है, और पहला प्रवेश पश्चिमी उत्तरी अमेरिका में 30 अक्टूबर 2026 को।
दक्षिण भारत के तमिल पंचांग इस राशि परिवर्तन को गुरु पेयर्ची कहते हैं, और उनमें से कुछ पुरानी वाक्य पद्धति अपनाते हैं, जो इसे यहाँ की आधुनिक गणना से अलग दिन पर रख सकती है। पश्चिमी ज्योतिष सायन राशिचक्र का उपयोग करता है, जो निरयण से लगभग चौबीस अंश आगे है, इसलिए सायन गणना में गुरु सिंह में निरयण से कई महीने पहले पहुँच जाते हैं। उत्तर भारत में इसे गुरु गोचर या बृहस्पति का राशि परिवर्तन कहा जाता है; नाम अलग हैं, घटना एक ही है।
शास्त्रीय स्रोत। मंत्रेश्वर की फलदीपिका, अध्याय 26 (गोचर फल): चंद्र राशि को आधार मानना, गुरु के शुभ भाव 2, 5, 7, 9 और 11, वेध (बाधा) भाव, भाव-दर-भाव फल, और अपनी, उच्च तथा शत्रु राशि के नियम। राशि परिवर्तन के समय लाहिड़ी अयनांश से, भारतीय मानक समय में।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
2026 में गुरु सिंह राशि में कब प्रवेश करते हैं?
शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को 11:17 बजे (भारतीय मानक समय), लाहिड़ी अयनांश से। इस दौर में सिंह में यह तीन प्रवेशों में से पहला है: 25 जनवरी 2027 को गुरु वापस कर्क में जाते हैं, 26 जून 2027 को फिर सिंह में आते हैं, और कन्या में कुछ समय बिताकर 28 फरवरी 2028 को एक बार और लौटते हैं।
बृहस्पति राशि परिवर्तन 2026 किस राशि से किस राशि में है?
31 अक्टूबर 2026 को बृहस्पति कर्क से सिंह राशि में जाते हैं। कर्क गुरु की उच्च राशि है और सिंह उनके मित्र सूर्य की राशि। वक्री चाल के कारण गुरु बीच में कर्क और कन्या में भी कुछ समय रहते हैं, इसलिए इस दौर के पाँच पड़ाव हैं, जो इस पेज की तालिका में दिए गए हैं।
गुरु सिंह राशि में कितने समय तक रहते हैं?
31 अक्टूबर 2026 के पहले प्रवेश से 24 जुलाई 2028 के अंतिम निकास तक लगभग 21 महीने हैं, पर इनमें से गुरु केवल लगभग साढ़े 12 महीने सिंह में रहते हैं, तीन पड़ावों में: 31 अक्टूबर 2026 से 25 जनवरी 2027 तक, 26 जून 2027 से 26 नवंबर 2027 तक, और 28 फरवरी 2028 से 24 जुलाई 2028 तक।
सिंह के गुरु किन चंद्र राशियों के लिए शुभ माने जाते हैं?
फलदीपिका चंद्रमा से दूसरे, पाँचवें, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव को गुरु के शुभ भाव बताती है। गुरु सिंह में हों, तो ये चंद्र राशियाँ कर्क, मेष, कुंभ, धनु और तुला हैं। ग्रंथ यह भी चाहता है कि उससे जुड़ा वेध भाव ग्रहों से खाली हो, और साथ में जन्म कुंडली और दशा भी पढ़ी जाती है।
क्या इस गोचर के दौरान गुरु वक्री होते हैं?
हाँ, दो बार। 13 दिसंबर 2026 को गुरु सिंह में वक्री होते हैं और 13 अप्रैल 2027 को कर्क में मार्गी, इसीलिए वे लगभग 5 महीने के लिए कर्क में लौटते हैं। उनका अगला वक्री काल 12 जनवरी 2028 को कन्या में शुरू होकर 14 मई 2028 को सिंह में समाप्त होता है।
गुरु पेयर्ची 2026 क्या है?
गुरु पेयर्ची गुरु के राशि परिवर्तन का तमिल नाम है। 2026 में यह गुरु का कडगम (कर्क) से सिम्मम (सिंह) में जाना है, जो आधुनिक लाहिड़ी गणना से 31 अक्टूबर 2026 को 11:17 बजे (भारतीय मानक समय) होता है। वाक्य पद्धति मानने वाले पंचांग अलग तारीख दे सकते हैं, इसलिए अपने परिवार का पंचांग भी देखें।
क्या यह मेरे लग्न पर निर्भर है?
शास्त्रीय गोचर अध्याय के अनुसार नहीं। गोचर फल चंद्र राशि से गिने जाते हैं, इसलिए एक ही चंद्र राशि वाले सभी लोगों के लिए गुरु एक ही भाव में होते हैं और तारीखें भी वही रहती हैं। लग्न से गिना गया गुरु का भाव एक अलग विश्लेषण है, जो पूरी जन्म कुंडली से किया जाता है।
आपकी चंद्र राशि पूरी कुंडली से मिलती है
मुफ़्त जन्म कुंडली किसी भी जन्म विवरण के लिए आपकी चंद्र राशि बताती है, और उसका अष्टकवर्ग टैब दिखाता है कि आपकी अपनी कुंडली गुरु के आठ संभव अंकों में से कितने सिंह, कर्क और कन्या को देती है। इस पेज की तारीखें गुरु के राशि परिवर्तन की हैं, जो सबके लिए एक जैसी हैं।
संबंधित गणनाएँ (अंग्रेज़ी में)
- Rahu Ketu Transit 2026Rahu in Capricorn and Ketu in Cancer from December 2026 to June 2028, with the house each takes from your Moon sign.
- Saturn Transit 2027Saturn's 2027, stay by stay: Pisces, Aries from 3 June, Pisces again from 20 October, with the house from your Moon sign and your sade sati or dhaiya dates.
अन्य गणनाएँ (अंग्रेज़ी में)
- Vimsopaka BalaScore each planet out of 20 on its dignity across the vargas — four schemes, from six charts to sixteen.
- Bhava BalaStrength of the twelve houses — lord, direction and aspect combined, then ranked one to twelve.
- Vimshottari DashaThe standard nakshatra dasha: 120 years across nine lords, with the period you were born partway through shown as a balance.
- Kalachakra DashaSign-based dasha periods read off the Moon's nakshatra pada, running forward or backward through the zodiac.
- Ashtottari DashaThe 108-year conditional dasha — eight lords instead of nine, counted from Ardra rather than Ashwini.
- Gulika, Mandi and UpagrahasAll eleven upagrahas — the five computed from the Sun and the six taken from the divisions of the day.
- Moon Sign (Rashi)The Moon's sidereal sign — your rashi — with nakshatra, pada and both lords, found from a birth date even without a time.
- Lagna (Ascendant)The rising sign at the birth moment — its degree, nakshatra and pada — and where the lagna lord sits.
- Sun Sign (Vedic and Western)Your Sun sign twice over — Vedic sidereal and Western tropical — with the ayanamsa gap and a cusp flag.
- Birth TithiYour birth tithi and the five limbs of the panchang at the birth moment, with the tithi's start and end times.
- Navamsa (D9) ChartDraw the D9 navamsa chart, with each planet's ninth-part sign and house and every vargottama placement flagged against the Rasi.
- D10 Dasamsa ChartThe D10 dasamsa: ten 3° parts per sign, each body's D10 sign and house, and the tenth house of the D10 examined.
- D7 Saptamsa ChartThe D7 saptamsa — seven parts of 4°17′ per sign, read classically for progeny, with the fifth house of the D7 examined.
- AtmakarakaFind your Atmakaraka and the seven karakas below it, ranked by degrees in sign with Rahu counted backwards.
- Ishta DevataTrace the ishta devata from the Atmakaraka's navamsa sign to the twelfth sign beyond it, the way the Jaimini Sutras do.
- Mangal DoshaManglik or not: Mars in the 2nd, 4th, 7th, 8th or 12th counted whole-sign from the lagna, with the Moon and Venus counts for reference.
- Kaal Sarp DoshaChecks whether the Sun through Saturn all lie between Rahu and Ketu, and names the form from Rahu's house.
- Pitra DoshaThe five traditional pitru dosha indicators, each shown as met or not met in your chart — indicators, not a verdict.
- Gemstone (Traditional)The traditional ratna for your lagna lord and the two trikona lords, beside what the classical text prescribes instead.
- DarakarakaFind the Dara Karaka under both classical schemes, with its D9 sign and its house counted from both ascendants.
- AmatyakarakaFind the Amatya Karaka, second only to the soul planet, with its D10 sign and its house from both lagnas.
- Arudha LagnaCount from each house to its lord and on again to find the AL and every pada of the birth chart, exceptions applied.
- Upapada LagnaThe arudha of the twelfth house, which Jaimini practice consults on marriage, with the second sign from it.
- ShadbalaThe six-fold strength of the Sun through Saturn, each component listed, totalled in rupas and measured against its classical minimum.
- AshtakavargaSarvashtakavarga points for all twelve signs, counted as houses from the Lagna, with each planet's own bindu table.
- D2 Hora ChartThe D2 hora — two halves per sign, every body in the Sun's Leo or the Moon's Cancer, the division Parashara gives to wealth.
- D3 Drekkana ChartThe D3 drekkana — three ten-degree parts per sign, counted through the sign's own trine, read classically for brothers and sisters.
- D4 Chaturthamsa ChartThe D4 chaturthamsa — four quarters per sign, counted through the sign's kendras, read for fortune, residence and property.
- D16 Shodasamsa ChartThe D16 shodasamsa — sixteen narrow parts per sign, started from Aries, Leo or Sagittarius by sign type, read for conveyances and comforts.
- D30 Trimsamsa ChartThe D30 trimsamsa — five unequal bands per sign, each ruled by one of the five non-luminary planets, read classically for difficulties.
- D60 Shashtiamsa ChartThe D60 shashtiamsa: sixty half-degree parts per sign, each body's D60 sign and house, and the named deity of its part.
- Bhrigu BinduThe Moon–Rahu midpoint of the Nadi tradition: the arc, its half, the point's sign and house, and the other convention beside it.
- Indu LagnaThe sign counted from the Moon with the kalas of the ninth lords from the lagna and the Moon, traditionally consulted on wealth.
- Nadi DoshaCompares two birth nakshatras: Adi, Madhya or Antya nadi, the 8-point Nadi koota, and the traditional exceptions.
- Bhakoot DoshaCounts one Moon sign from the other: the 2-12, 5-9 and 6-8 doshas, the 7-point Bhakoot koota and the lord exceptions.
- Shani DhaiyaLists Saturn's two-and-a-half-year passages through the 4th and 8th signs from your Moon sign, with dates.
- Yogini DashaYogini dasha: eight periods of 1 to 8 years in a 36-year round, counted from the Moon's nakshatra, with dates and sub-periods.
- Chara Dasha (Jaimini)Jaimini chara dasha: twelve sign periods from the lagna, each sign's years counted to its lord, dated across two cycles.