भाई दूज 2027: तिलक का समय, यम द्वितीया की कथा और परंपराएँ
भाई दूज, जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है और इसी के साथ दीपावली का पाँच दिनों का उत्सव पूरा होता है। इस दिन बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है, आरती उतारती है, अपने हाथ का बना भोजन कराती है और उसकी लंबी आयु व कुशलता की प्रार्थना करती है। 2027 की तिथि और तिलक का अपराह्न मुहूर्त यहाँ नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त के आधार पर निकाला गया है; नीचे इसका नियम, पूजा विधि और अलग-अलग प्रदेशों की परंपराएँ दी गई हैं।
भाई दूज 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)
भाई दूज 2027 रविवार, 31 अक्टूबर 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में भाई दूज 30 अक्टूबर को पड़ने वाले गोवर्धन पूजा के 1 दिन बाद और 4 नवंबर को पड़ने वाले छठ पूजा से 4 दिन पहले है।
| तारीख | रविवार, 31 अक्टूबर 2027 |
|---|---|
| तिथि | कार्तिक शुक्ल द्वितीया |
| द्वितीया तिथि | 30 अक्टूबर, 17:53 से 31 अक्टूबर, 17:14 तक |
| अपराह्न | 31 अक्टूबर, 13:10 से 15:22 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
भाई दूज: अर्थ, नियम और परंपराएँ
यमराज और यमुना की कथा
भाई दूज का पुराना नाम यम द्वितीया एक पौराणिक कथा से आया है। सूर्यदेव की संतान यमराज और यमुना जुड़वाँ भाई-बहन थे। यमुना बार-बार अपने भाई को घर आने का न्योता देतीं, पर जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा करने में व्यस्त यमराज हर बार बात टाल जाते। आख़िरकार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को वे बहन के घर पहुँचे। यमुना ने उनका स्वागत किया, माथे पर तिलक लगाया और अपने हाथों से बना भोजन परोसा। प्रसन्न होकर यमराज ने वर दिया, और मान्यता है कि जो भाई इस दिन बहन से तिलक करवाकर उसके हाथ का भोजन करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता।
लोक में एक और कथा बहुत प्रचलित है। नरकासुर का वध करने के बाद श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने गए और सुभद्रा ने दीप, फूल, मिठाई और तिलक से उनका स्वागत किया। आज भी घर-घर में वही स्वागत दोहराया जाता है। इस पर्व के नाम भी कई हैं: हिंदी भाषी घरों में भैया दूज, शास्त्रों में भ्रातृ द्वितीया, बंगाल में भाई फोंटा, महाराष्ट्र और गोवा में भाऊबीज, गुजरात में भाई बीज और नेपाल में भाई टीका।
कायस्थ परिवार इसी दिन चित्रगुप्त पूजा करते हैं। चित्रगुप्त यमराज के लेखाकार माने जाते हैं, जो हर प्राणी के कर्मों का हिसाब लिखते हैं, इसलिए इस दिन कलम-दवात और बही-खातों की पूजा होती है। इस तरह दीपावली का सप्ताह आतिशबाज़ी के शोर पर नहीं, बल्कि परिवार, कृतज्ञता और भाई-बहन के स्नेह पर आकर थमता है।
भाई दूज की तिथि का नियम
भाई दूज चंद्र तिथि से तय होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को पड़ता है। शुक्ल पक्ष का पर्व होने के कारण उत्तर भारत के पूर्णिमांत और गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत के अमांत, दोनों पंचांगों में महीने का नाम कार्तिक ही रहता है। सामान्यतः यह लक्ष्मी पूजा के दो दिन बाद और गोवर्धन पूजा के अगले दिन आता है, और अंग्रेज़ी कैलेंडर में अक्टूबर के आख़िरी दिनों से नवंबर के मध्य तक कभी भी पड़ सकता है।
इस पर्व का निर्णायक समय अपराह्न काल है। धर्मशास्त्र के ग्रंथ सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को पाँच बराबर भागों में बाँटते हैं: प्रातः, संगव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न। इनमें चौथा भाग अपराह्न है, यानी दोपहर ढलने के बाद का वह समय जो शाम से काफ़ी पहले समाप्त हो जाता है। नियम है कि इस समय द्वितीया विद्यमान हो, इसीलिए पंचांगों में भाई दूज के तिलक का शुभ मुहूर्त प्रायः दोपहर बाद का दिया जाता है, सुबह का नहीं।
तिथि किसी भी घड़ी शुरू हो सकती है। कभी द्वितीया एक दिन देर से लगकर अगले दिन जल्दी उतर जाती है और किसी भी दिन का अपराह्न पूरा नहीं ढकती, तो कभी दोनों दिनों के अपराह्न को आंशिक रूप से छू लेती है। ऐसे में पंचांगकार निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों के नियम लागू करते हैं, पर सब उन्हें एक जैसा नहीं पढ़ते, इसलिए “भाई दूज कब है” खोजने पर कभी-कभी दो तारीखें दिख जाती हैं। इसी वजह से किसी वर्ष गोवर्धन पूजा और भाई दूज एक ही दिन पड़ते हैं, तो किसी वर्ष दिवाली के बाद एक दिन का खाली अंतर आ जाता है। यहाँ दी गई तारीख और मुहूर्त नई दिल्ली के अपराह्न काल पर यही नियम लागू करके निकाले गए हैं।
भाई दूज पर तिलक की विधि
तैयारी बहन के हाथ में होती है। वह सुबह जल्दी स्नान करती है, और बहुत सी बहनें तिलक होने तक व्रत रखती हैं, कुछ तो निर्जला भी। थाली में रोली या कुमकुम, अक्षत, घी का छोटा दीया, मिठाई और नारियल या थोड़े सूखे मेवे सजाए जाते हैं। भाई के बैठने के लिए एक छोटी चौकी या पीढ़ा रखा जाता है और उसके आसपास अक्सर सादी-सी रंगोली बना दी जाती है।
ज़्यादातर घरों में क्रम सीधा-सादा है। पहले भाई चौकी पर बैठता है, और परिवार की रीति के अनुसार उसका मुख प्रायः उत्तर या पूर्व की ओर रखा जाता है। फिर बहन उसके माथे पर रोली का तिलक करती है और उस पर अक्षत के कुछ दाने चिपका देती है। इसके बाद वह जलता दीया घुमाकर आरती उतारती है, मन ही मन भाई की कुशलता और लंबी आयु की प्रार्थना करती है और उसे मिठाई खिलाती है। अंत में भाई बहन को उपहार देता है, और बहुत से घरों में छोटे भाई-बहन बड़ों के पैर छूते हैं।
भोजन इस अनुष्ठान का अभिन्न अंग है, कोई गौण बात नहीं। परंपरा कहती है कि इस दिन भाई बहन के घर भोजन करे, इसलिए भाई अपनी विवाहित बहन की ससुराल जाते हैं और प्रायः उसके परिवार के लिए मिठाई ले जाते हैं। बहन का बनाया भोजन, उसका लगाया तिलक और उसकी प्रार्थना, तीनों मिलकर ही यह पर्व पूरा करते हैं।
परंपरा में क्या करें, किससे बचें
परंपरा के अनुसार तिलक अपराह्न के मुहूर्त में किया जाता है, और कुछ परिवार उस अवधि में राहुकाल को भी टाल देते हैं। भाई कोशिश करते हैं कि बहन से मिलने ख़ुद पहुँचें; जहाँ दूरी आड़े आ जाए, वहाँ कई बहनें रोली, अक्षत और मिठाई पहले ही भेज देती हैं या वीडियो कॉल पर आरती कर लेती हैं, और चचेरे-ममेरे भाई-बहन भी इस रस्म में सगे भाई-बहनों की तरह शामिल किए जाते हैं।
बहुत से घरों में इस दिन किसी तरह का झगड़ा नहीं किया जाता, क्योंकि मनमुटाव भुलाना ही इस पर्व की भावना है। कई भाई बहन के घर भोजन करने से पहले अपने घर की रसोई का खाना नहीं खाते। त्योहार के भोजन में मांस और मदिरा प्रायः नहीं रखे जाते। जो बहनें बुज़ुर्ग, अस्वस्थ या गर्भवती हैं, उन्हें रीति के अनुसार कठोर व्रत से छूट है, और तिलक से पहले फल या हल्का भोजन लेना परंपरा के विरुद्ध नहीं माना जाता।
भाई फोंटा, भाऊबीज, भाई टीका और दूसरे रूप
मथुरा में इस दिन भाई-बहन विश्राम घाट पर साथ-साथ यमुना में स्नान करते हैं, जो सीधे यम और यमुना की कथा से जुड़ी परंपरा है, और वहीं स्थित यमराज-यमुना के मंदिर में दर्शन करते हैं, जिसे धर्मराज मंदिर भी कहते हैं। बंगाल के भाई फोंटा की अपनी पहचान है: बहन चंदन, काजल और दही में उँगली डुबोकर भाई के माथे पर फोंटा लगाती है और साथ में एक पारंपरिक छंद बोलती है, जिसमें यम के द्वार पर काँटा बिछाने की बात आती है।
महाराष्ट्र और गोवा में भाऊबीज मनाई जाती है। भाई को सजे हुए पाट पर बिठाया जाता है, आसपास रंगोली बनती है, बहन औक्षण करती है, जो वहाँ आरती का पारंपरिक रूप है, और भोजन में अक्सर बासुंदी-पूरी परोसी जाती है। गुजरात में भाई बीज इसी भाव से नए वर्ष के उत्सवों के साथ मनाई जाती है।
नेपाल में भाई टीका तिहार पर्व का अंतिम दिन है। बहनें भाई के माथे पर सप्तरंगी यानी सात रंगों का टीका लगाती हैं, मखमली फूलों की माला पहनाती हैं और भाई के चारों ओर तेल की धार से एक रक्षा-रेखा खींचती हैं।
यम द्वितीया का ज्योतिषीय महत्व
द्वितीया तिथि के शास्त्रीय देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं, और यह तिथि भद्रा वर्ग में आती है। यहाँ भद्रा का अर्थ कल्याणकारी है; इसे विष्टि करण वाली उस भद्रा से नहीं मिलाना चाहिए जिसमें शुभ कार्य टाले जाते हैं। शुक्ल द्वितीया में विष्टि करण आता ही नहीं; इसके दोनों आधे भागों में बालव और कौलव करण होते हैं, जिन्हें सामान्य शुभ कामों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
भाई दूज पर चंद्रमा सूर्य से केवल 12 से 24 अंश आगे होता है, इसलिए सूर्यास्त के कुछ देर बाद पश्चिमी आकाश में नीचे पतला-सा नया चाँद अक्सर दिख जाता है। सूर्य निरयण तुला राशि में होता है, और चंद्रमा प्रायः तुला या वृश्चिक राशि में, अधिकतर विशाखा या अनुराधा नक्षत्र में होता है। अनुराधा के अधिष्ठाता देवता मित्र हैं, जो वैदिक परंपरा में मैत्री और निष्ठा के देवता हैं, और भाई-बहन के स्नेह को समर्पित दिन के लिए यह संयोग सार्थक माना जाता है।
पूरा दीपोत्सव यमराज के स्मरण से घिरा है। धनतेरस की शाम दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यम के नाम का दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपदान कहते हैं, और सप्ताह का समापन यम द्वितीया से होता है। प्रतीक रूप में देखें तो यह पर्व-शृंखला मृत्यु के स्मरण से शुरू होकर उसी पर पूरी होती है और उसका उत्तर प्रकाश और पारिवारिक प्रेम से देती है।
इस सप्ताह और क्या है
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — कार्तिक अमावस्या
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
अक्टूबर 2027 के और व्रत-त्योहार
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 11 अक्टूबर — पापांकुशा एकादशी
- शुक्रवार, 15 अक्टूबर — आश्विन पूर्णिमा
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- सोमवार, 18 अक्टूबर — तुला संक्रांति
- सोमवार, 25 अक्टूबर — रमा एकादशी
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
भाई दूज 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भाई दूज 2027 कब है और तिलक का शुभ मुहूर्त क्या है?
भाई दूज 2027 रविवार, 31 अक्टूबर 2027 को है (नई दिल्ली)। भाई दूज कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है, और तिलक के लिए वह समय श्रेष्ठ माना जाता है जब अपराह्न काल में द्वितीया विद्यमान हो। 2027 की तारीख और नई दिल्ली के लिए तिलक का मुहूर्त इस पृष्ठ के समय वाले हिस्से में दिया गया है।
कुछ पंचांगों में भाई दूज 2027 अलग दिन क्यों दिखाया जाता है?
द्वितीया शायद ही कभी सूर्योदय से शुरू होती है, इसलिए वह दो लगातार दिनों के अपराह्न को आधा-अधूरा छू सकती है या किसी को भी पूरा नहीं ढकती। तब पंचांगकार शास्त्रीय निर्णय-नियम अपनाते हैं और कभी-कभी अलग नतीजे पर पहुँचते हैं। जिस पंचांग को आपका परिवार मानता है, उसी का पालन करें।
क्या भाई दूज का तिलक सुबह किया जा सकता है?
बहुत से परिवार उसी समय तिलक कर लेते हैं जब सब भाई-बहन इकट्ठा हो पाते हैं, पर शास्त्रीय दृष्टि से दोपहर बाद का समय श्रेष्ठ है, क्योंकि नियम उसी समय द्वितीया की उपस्थिति माँगता है। मुहूर्त को महत्व देने वाले लोग अपराह्न काल की प्रतीक्षा करते हैं।
भाई दूज और रक्षाबंधन में क्या अंतर है?
रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को आता है और उसमें बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है। भाई दूज दिवाली के बाद आता है, इसके केंद्र में तिलक और बहन के हाथ का भोजन है, और इससे यम-यमुना की कथा जुड़ी है।
भाई दूज की थाली में क्या-क्या रखें?
रोली या कुमकुम, अक्षत, घी का छोटा दीया और मिठाई मूल सामग्री है, और साथ में नारियल या सूखे मेवे भी रखे जाते हैं। बंगाल में चंदन, काजल और दही का फोंटा लगता है, जबकि नेपाल में सप्तरंगी टीका और मखमली फूलों की माला होती है।
क्या 2027 में चित्रगुप्त पूजा भी भाई दूज के दिन ही है?
दोनों कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाते हैं, इसलिए कायस्थ परिवार सामान्यतः उसी दिन चित्रगुप्त पूजा करते हैं जिस दिन भाई दूज होता है। इस पृष्ठ पर नई दिल्ली के लिए दी गई तारीख दोनों पर लागू होती है।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- भाई दूज 2026 — बुधवार, 11 नवंबर 2026
- पिछला त्योहार: गोवर्धन पूजा 2027 — 30 अक्टूबर
- अगला त्योहार: छठ पूजा 2027 — 4 नवंबर
- 2027 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2027 का त्योहार कैलेंडर
- शुक्रवार, 15 जनवरी — मकर संक्रांति
- गुरुवार, 11 फरवरी — वसंत पंचमी
- शनिवार, 6 मार्च — महाशिवरात्रि
- रविवार, 21 मार्च — होलिका दहन
- सोमवार, 22 मार्च — होली
- बुधवार, 7 अप्रैल — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 15 अप्रैल — राम नवमी
- मंगलवार, 20 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 9 मई — अक्षय तृतीया
- रविवार, 18 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- शुक्रवार, 6 अगस्त — नाग पंचमी
- मंगलवार, 17 अगस्त — रक्षा बंधन
- बुधवार, 25 अगस्त — कृष्ण जन्माष्टमी
- शनिवार, 4 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- गुरुवार, 16 सितंबर — पितृ पक्ष
- बुधवार, 29 सितंबर — सर्व पितृ अमावस्या
- गुरुवार, 30 सितंबर — शारदीय नवरात्रि
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
- रविवार, 31 अक्टूबर — भाई दूज
- गुरुवार, 4 नवंबर — छठ पूजा
- बुधवार, 10 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा