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देवउठनी एकादशी 2027: प्रबोधिनी व्रत, पारण और तुलसी विवाह

देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं, कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास पूरा होता है। 2027 में व्रत की तिथि और एकादशी का समय यहाँ नई दिल्ली के लिए दिया गया है; नीचे एकादशी के नियम, पूजा विधि, तुलसी विवाह और अलग-अलग प्रदेशों की परंपराएँ दी गई हैं।

देवउठनी एकादशी 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)

देवउठनी एकादशी 2027 बुधवार, 10 नवंबर 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में देवउठनी एकादशी 4 नवंबर को पड़ने वाले छठ पूजा के 6 दिन बाद और 14 नवंबर को पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा से 4 दिन पहले है।

तारीखबुधवार, 10 नवंबर 2027
तिथिकार्तिक शुक्ल एकादशी
एकादशी तिथि9 नवंबर, 07:36 से 10 नवंबर, 09:12 तक
द्वादशी आरंभ10 नवंबर, 09:12

सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।

देवउठनी एकादशी: अर्थ, नियम और परंपराएँ

भगवान विष्णु का जागरण और प्रबोधिनी का अर्थ

पौराणिक मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी, यानी देवशयनी एकादशी को, भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद के चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं, जो व्रत, स्वाध्याय और संयम का समय माना जाता है, और इस दौरान बहुत से परिवार विवाह और दूसरे बड़े संस्कार टाल देते हैं। प्रबोधिनी का अर्थ है “जगाने वाली”, और देवोत्थान का अर्थ है “देव का उठना”: इस एकादशी को भगवान विष्णु आँखें खोलते हैं और उनके साथ ही शुभ कार्यों के द्वार फिर खुल जाते हैं।

यह दिन तुलसी विवाह से भी जुड़ा है, जिसमें तुलसी के पौधे का विवाह शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से कराया जाता है। पौराणिक कथा के प्रचलित रूप में वृंदा असुर जालंधर की पतिव्रता पत्नी थीं, और जालंधर की शक्ति उन्हीं के पतिव्रत पर टिकी थी। उसके अत्याचार का अंत करने के लिए विष्णु ने जालंधर का रूप धरकर वृंदा को छला, और जालंधर युद्ध में मारा गया। वृंदा ने विष्णु को पत्थर हो जाने का शाप दिया, जिसे परंपरा शालिग्राम शिला की उत्पत्ति मानती है, और वे स्वयं तुलसी के रूप में प्रकट हुईं। विष्णु ने वचन दिया कि वे इसी रूप में उनसे विवाह करेंगे, और हर वर्ष घर-घर में उसी वचन को निभाया जाता है।

प्रबोधिनी से ही दो छोटे पर्व-काल शुरू होते हैं जो कार्तिक पूर्णिमा तक चलते हैं: भीष्म पंचक, महाभारत के पितामह भीष्म के नाम पर पाँच दिन का व्रत, और तुलसी विवाह का समय। वैष्णवों के लिए यह वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक है, और महाराष्ट्र में इसे कार्तिकी एकादशी के रूप में मनाया जाता है।

एकादशी के नियम: व्रत का दिन और पारण कैसे तय होता है

देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है। शुक्ल पक्ष में पड़ने के कारण उत्तर भारत के पूर्णिमांत और गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिण के अमांत, दोनों पंचांगों में इसका महीना कार्तिक ही रहता है। यह दिवाली के लगभग ग्यारह दिन बाद आती है और प्रायः अक्टूबर के अंत या नवंबर में पड़ती है।

व्रत का दिन दोपहर या शाम से नहीं, दिन की शुरुआत से तय होता है। स्मार्त परिवार सामान्यतः उस दिन व्रत रखते हैं जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी हो। वैष्णव नियम अधिक कड़ा है: यदि अरुणोदय, यानी सूर्योदय से पहले के भोर के समय, में भी पिछली तिथि दशमी मौजूद हो, तो वह एकादशी दशमी से विद्ध मानी जाती है और व्रत अगले दिन रखा जाता है। इसीलिए कुछ वर्षों में पंचांगों में दो तिथियाँ छपती हैं, एक स्मार्तों के लिए और एक वैष्णवों के लिए, और “देवउठनी एकादशी कब है” खोजने पर दोनों दिख जाती हैं।

व्रत खोलने यानी पारण का अपना नियम है। पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है, पर हरि वासर में नहीं, जो द्वादशी का पहला चौथाई भाग है, और द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण पूरा हो जाना चाहिए। इस पृष्ठ पर नई दिल्ली के लिए एकादशी का समय और द्वादशी के आरंभ का क्षण दिया गया है; अपने शहर के सूर्योदय के अनुसार पारण का ठीक समय स्थानीय पंचांग में देखें।

पूजा विधि: देवों को जगाने की रीति

सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर में भगवान विष्णु जिस रूप में विराजते हों, मूर्ति, चित्र या शालिग्राम, उसी रूप की पूजा जल या पंचामृत, पीले वस्त्र, चंदन, फूल, एक दिन पहले तोड़े गए तुलसी दल, धूप, घी के दीपक और फल से की जाती है। बहुत से भक्त विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं या एकादशी व्रत कथा सुनते हैं, और दिन भजन-कीर्तन में बिताते हैं।

देवों को जगाने की रस्म शाम को होती है। शंख बजाए जाते हैं, घंटियाँ बजती हैं और गीत गाकर देवता को उठाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में स्त्रियाँ आँगन या फ़र्श पर गेरू और चावल के घोल से देवताओं की आकृतियाँ बनाती हैं, उन्हें छलनी या सूप से ढक देती हैं, और उसे पीटते हुए पारंपरिक गीत गाती हैं जिनमें देवों से उठने की विनती होती है। देवता के ऊपर अक्सर गन्ने का छोटा मंडप बनाया जाता है, और मौसम की पहली उपज चढ़ाई जाती है: गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर और आँवला। पूरे घर में दीये जलाए जाते हैं और कुछ परिवार रात भर जागरण करते हैं।

तुलसी विवाह प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच किया जाता है, सबसे अधिक द्वादशी को। तुलसी के गमले को दुल्हन की तरह लाल चुनरी, चूड़ियों और सिंदूर से सजाया जाता है, उसके चारों ओर गन्ने का मंडप बनता है, और शालिग्राम या विष्णु की प्रतिमा दूल्हे के रूप में रखी जाती है। मंगल गीतों के बीच दोनों के फेरे कराए जाते हैं और किसी भी विवाह की तरह प्रसाद बाँटा जाता है।

व्रत की परंपराएँ और किन बातों से बचें

हर एकादशी की तरह इस दिन भी परंपरा से चावल और दूसरे अन्न नहीं खाए जाते। सबसे कठोर व्रत रखने वाले निर्जला उपवास करते हैं; बहुत से लोग फल, दूध और मेवे वाला फलाहारी व्रत रखते हैं, या साबूदाना, सिंघाड़े के आटे या आलू से बना एक समय का भोजन सेंधा नमक के साथ लेते हैं। बुज़ुर्गों, अस्वस्थ लोगों और गर्भवती स्त्रियों के लिए रीति में हल्के व्रत की छूट है।

बहुत से घरों में एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लिए जाते हैं। प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा रसोई से दूर रखे जाते हैं, दिन बिना कलह के बिताया जाता है, और कठोर व्रत रखने वाले दिन में सोने से बचते हैं। परंपरा के अनुसार व्रत को द्वादशी के बाद तक नहीं खींचा जाता; ज़रूरत हो तो केवल जल और एक तुलसी दल से ही सही, पर पारण द्वादशी रहते ही कर लिया जाता है।

पंढरपुर से पुष्कर तक: प्रदेशों की परंपराएँ

महाराष्ट्र में यह दिन कार्तिकी एकादशी है। वारी परंपरा के यात्री वारकरी संतों के अभंग गाते हुए पंढरपुर पहुँचते हैं और विठ्ठल के दर्शन करते हैं, जो वहाँ विष्णु के रूप में पूजे जाते हैं। राजस्थान में पुष्कर मेला इसी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है, जिसमें पशुओं का व्यापार, लोक कलाओं के प्रदर्शन और पुष्कर सरोवर में पवित्र स्नान, सब एक साथ होते हैं।

गुजरात में तुलसी विवाह पूरे पारिवारिक विवाह की धूमधाम से होता है, सजे हुए मंडप से लेकर भोज तक, और उसके बाद के दिन पूर्णिमा की देव दिवाली तक उत्सव का माहौल बनाए रखते हैं। मथुरा और वृंदावन के मंदिरों में प्रबोधिनी पर विशेष दर्शन और कीर्तन होते हैं; वहाँ के वैष्णव पूरे कार्तिक मास को श्रीकृष्ण को दीप अर्पित करने का महीना मानते हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में सूप पीटने की रस्म और गन्ने का मंडप देवउठनी को मंदिर जितना ही घर-आँगन का पर्व बना देते हैं, और इसे आम तौर पर वह क्षण माना जाता है जब विवाह और दूसरे पारिवारिक संस्कारों का मौसम फिर से शुरू होता है।

प्रबोधिनी एकादशी का ज्योतिषीय महत्व

एकादशी के शास्त्रीय देवता विश्वेदेव हैं, यानी सभी देवताओं का समूह, और यह नंदा वर्ग की तिथि है। अगली तिथि द्वादशी के स्वामी भगवान विष्णु यानी हरि हैं, इसलिए एकादशी का व्रत विष्णु की अपनी तिथि पर खोला जाता है, और उस तिथि के पहले चौथाई भाग, हरि वासर, में भोजन नहीं किया जाता। शुक्ल एकादशी के उत्तरार्ध में विष्टि करण यानी भद्रा रहती है, जिसे मुहूर्त ग्रंथ शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए वर्जित मानते हैं।

इस एकादशी पर चंद्रमा सूर्य से 120 से 132 अंश आगे होता है, यानी बढ़ता हुआ, लगभग तीन-चौथाई प्रकाशित चाँद, जो शाम तक आकाश में ऊँचा चढ़ आता है, और जागरण की रात चाँदनी से भरी रहती है। चंद्रमा प्रायः निरयण कुंभ या मीन राशि में, शतभिषा से रेवती नक्षत्र के बीच कहीं होता है, और सूर्य तुला राशि में या वृश्चिक के आरंभिक अंशों में रहते हैं।

चातुर्मास भले ही इस दिन पूरा हो जाए, विवाह के मुहूर्त तभी खुलते हैं जब दूसरी शास्त्रीय शर्तें भी पूरी हों। मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार यह भी आवश्यक है कि गुरु और शुक्र अस्त न हों, यानी सूर्य के इतने निकट न हों कि दिखाई न दें, और सूर्य धनु राशि में न हों। इसलिए विवाह का पहला शुभ मुहूर्त कभी-कभी देवउठनी एकादशी के कुछ दिन या कुछ सप्ताह बाद आता है।

इस सप्ताह और क्या है

इन सात दिनों में कोई और व्रत या त्योहार नहीं है।

नवंबर 2027 के और व्रत-त्योहार

  • गुरुवार, 4 नवंबर — छठ पूजा
  • रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा
  • बुधवार, 17 नवंबर — वृश्चिक संक्रांति
  • बुधवार, 24 नवंबर — उत्पन्ना एकादशी
  • रविवार, 28 नवंबर — मार्गशीर्ष अमावस्या

देवउठनी एकादशी 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देवउठनी एकादशी 2027 कब है और व्रत का पारण कब करें?

देवउठनी एकादशी 2027 बुधवार, 10 नवंबर 2027 को है (नई दिल्ली)। व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी को रखा जाता है और द्वादशी को हरि वासर बीतने के बाद खोला जाता है। 2027 की व्रत तिथि, एकादशी का समय और नई दिल्ली के लिए द्वादशी का आरंभ इस पृष्ठ की समय-सूची में दिए गए हैं।

देवउठनी एकादशी 2027 की स्मार्त और वैष्णव तिथि अलग क्यों हो सकती है?

वैष्णव उस एकादशी को छोड़ देते हैं जिसे भोर के अरुणोदय काल में दशमी छू रही हो, और अगले दिन व्रत रखते हैं, जबकि स्मार्त सामान्यतः सूर्योदय के समय की एकादशी मानते हैं। जिस वर्ष दशमी भोर तक बनी रहती है, उस वर्ष दोनों नियमों से अलग दिन निकलते हैं।

2027 में तुलसी विवाह कब है?

तुलसी विवाह प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन किया जा सकता है, और सबसे अधिक द्वादशी को होता है। परिवार इसी अवधि में दिन चुनते हैं; इस पृष्ठ पर दिए एकादशी के समय और द्वादशी का आरंभ इसमें मदद करते हैं।

क्या देवउठनी एकादशी के तुरंत बाद विवाह शुरू हो जाते हैं?

चातुर्मास की रोक हट जाती है, पर विवाह मुहूर्त इस पर भी निर्भर करते हैं कि गुरु और शुक्र उदित हों और सूर्य धनु राशि में न हों। इसलिए विवाह की पहली शुभ तारीख एकादशी के कुछ दिन या सप्ताह बाद भी पड़ सकती है।

एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

अन्न और चावल नहीं खाए जाते। संकल्प के अनुसार भक्त या तो कुछ नहीं लेते, या केवल जल, या फिर फल, दूध, मेवे और सेंधा नमक के साथ साबूदाना, सिंघाड़े के आटे या आलू से बने व्यंजन लेते हैं।

हरि वासर क्या है और पारण में इसका क्या महत्व है?

हरि वासर द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग है। परंपरा के अनुसार इस दौरान एकादशी का व्रत नहीं खोला जाता, इसलिए पारण इसके समाप्त होने के बाद शुरू होता है और द्वादशी खत्म होने से पहले पूरा कर लिया जाता है।

दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार

2027 का त्योहार कैलेंडर

हर त्योहार की तारीख उसके शास्त्रीय नियम को नई दिल्ली के पंचांग पर लागू करके निकाली गई है और प्रकाशित पंचांगों से मिलाई गई है। क्षेत्र और परिवार की परंपराएँ अलग हो सकती हैं; अपने घर के लिए कुल पुरोहित या स्थानीय पंचांग की बात को अंतिम मानें।