गुरु पूर्णिमा 2027: आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूजा और गुरु वंदना
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा कहते हैं, और यह दिन उन सभी गुरुओं के प्रति आभार का है जिन्होंने जीवन को दिशा दी। विद्यार्थी, संगीतकार, संन्यासी और गृहस्थ, सभी इसे अपने-अपने ढंग से मनाते हैं। 2027 की तिथि और पूर्णिमा के आरंभ-समाप्ति का समय यहाँ नई दिल्ली के अनुसार दिया गया है।
गुरु पूर्णिमा 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)
गुरु पूर्णिमा 2027 रविवार, 18 जुलाई 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में गुरु पूर्णिमा 9 मई को पड़ने वाले अक्षय तृतीया के 70 दिन बाद और 6 अगस्त को पड़ने वाले नाग पंचमी से 19 दिन पहले है।
| तारीख | रविवार, 18 जुलाई 2027 |
|---|---|
| तिथि | आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा |
| पूर्णिमा तिथि | 17 जुलाई, 18:49 से 18 जुलाई, 21:16 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
गुरु पूर्णिमा: अर्थ, नियम और परंपराएँ
आषाढ़ की पूर्णिमा गुरु को क्यों समर्पित है
परंपरा में ‘गु’ को अंधकार और ‘रु’ को उसे दूर करने वाला कहा गया है, यानी गुरु वह है जो अज्ञान का अंधेरा मिटाए। यह दिन गुरुओं की पूरी शृंखला का सम्मान है, आध्यात्मिक मार्गदर्शक से लेकर उस शिक्षक तक जिसने पहली बार अक्षर पहचानना या तानपूरा थामना सिखाया। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। वेद को चार भागों में व्यवस्थित करने, महाभारत की रचना करने और पुराणों के संकलन का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है, और बाद के गुरुओं ने जो कुछ सिखाया उसका बड़ा भाग उन्हीं से होकर आता है। इसीलिए पहली पूजा उनकी होती है और यह दिन व्यास पूर्णिमा भी कहलाता है।
बौद्ध परंपरा इसी पूर्णिमा को धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के रूप में मनाती है, और श्रीलंका में इसे एसाला पोया कहते हैं। यह सारनाथ के मृगदाव में भगवान बुद्ध के पहले उपदेश की स्मृति है, जो उन्होंने अपने पाँच पुराने साथियों को दिया था और जिससे धर्म का चक्र घूमना शुरू हुआ माना जाता है। श्रीलंका, थाईलैंड और दूसरे थेरवाद देशों में यह वर्ष की प्रमुख पूर्णिमाओं में से एक है।
यह दिन एक नए काल की शुरुआत भी है। संन्यासियों का चातुर्मास्य व्रत इसी पूर्णिमा से आरंभ होता है: वे भ्रमण छोड़कर पूरी वर्षा ऋतु एक ही स्थान पर रहते हैं और वहाँ आने वालों को उपदेश देते हैं। शंकराचार्य परंपरा के मठ इसकी शुरुआत व्यास पूजा से करते हैं, जिसमें व्यास जी के साथ उनके बाद की पूरी गुरु परंपरा का पूजन होता है।
गुरु पूर्णिमा की तिथि कैसे तय होती है
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है, यानी पक्ष की पंद्रहवीं और अंतिम तिथि, जब चंद्रमा सूर्य से 168 से 180 अंश आगे होता है। पूर्णिमा पर शुक्ल पक्ष पूरा होता है, इसलिए पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांग इसे आषाढ़ पूर्णिमा ही कहते हैं। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः जुलाई में पड़ती है और कभी-कभी जून के आख़िरी दिनों में।
अधिकतर पंचांग इसे उस दिन मानते हैं जिस दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा हो, यानी उदया तिथि के सिद्धांत पर, जो बहुत से पर्वों में लागू होता है। पर तिथि का आरंभ और अंत कैलेंडर की तारीख़ से बँधा नहीं होता। जब पूर्णिमा एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय के कुछ ही देर बाद समाप्त हो जाती है, तब पंचांगकार यह देखते हैं कि दिन में तिथि कितनी देर रहनी चाहिए, और इन शास्त्रीय नियमों को अलग ढंग से पढ़ने पर एक दिन का अंतर आ जाता है। ‘गुरु पूर्णिमा कब है’ खोजने पर दो तारीखें दिखें तो प्रायः यही कारण होता है। इस पृष्ठ पर दी गई तिथि उदया तिथि के नियम और नई दिल्ली के सूर्योदय पर आधारित है, और पूर्णिमा के आरंभ तथा समाप्ति का समय भी दिया गया है ताकि आप अपने पंचांग से मिलान कर सकें।
व्यास पूजा, पादुका पूजन और गुरु दक्षिणा
दिन की शुरुआत स्नान और स्वच्छ वस्त्रों से होती है। एक साफ़ आसन पर व्यास जी का चित्र, अपने गुरु का चित्र या गुरु की पादुकाएँ रखी जाती हैं, जो गुरु की उपस्थिति का प्रतीक मानी जाती हैं। संकल्प के बाद चरणों या पादुकाओं को जल से धोया जाता है, फिर चंदन, अक्षत, फूल, धूप, दीप और फल या मिठाई अर्पित करके आरती की जाती है। इसके बाद बहुत से लोग स्वयं व्यास जी की रचनाओं का पाठ करते हैं: विष्णु सहस्रनाम और श्रीमद्भगवद्गीता, दोनों महाभारत के ही अंश हैं।
जो शिष्य जा सकते हैं, वे अपने गुरु के पास जाकर प्रणाम करते हैं, सत्संग में बैठते हैं और आभार के रूप में गुरु दक्षिणा अर्पित करते हैं। संगीत और नृत्य में, जहाँ विद्या आज भी गुरु-शिष्य परंपरा से ही आगे बढ़ती है, विद्यार्थी अपने गुरुओं के सामने प्रस्तुति देकर आशीर्वाद लेते हैं। कुछ घरों में शाम तक व्रत रखा जाता है और पूजा के बाद ही भोजन होता है। जिनका कोई व्यक्तिगत गुरु नहीं है, वे प्रायः व्यास जी, अपने माता-पिता या मार्ग दिखाने वाले किसी ग्रंथ का पूजन करते हैं।
गुरु पूर्णिमा पर क्या करें, किन बातों से बचें
इस दिन का भाव कृतज्ञता है, इसलिए इसकी रीतियाँ भी सरल हैं। लोग अपने पुराने शिक्षकों से मिलते या फ़ोन करते हैं, बड़ों के चरण छूते हैं, विद्यार्थियों और विद्वानों को पुस्तकें या भोजन देते हैं या उनकी पढ़ाई का शुल्क भरते हैं, और कुछ समय स्वाध्याय या पाठ में बिताते हैं। बहुत से आश्रम और संप्रदाय दीक्षा के लिए यही दिन चुनते हैं, और कई लोग इसी पूर्णिमा से कोई नई विद्या, जैसे कोई वाद्य या कोई ग्रंथ, सीखना शुरू करते हैं।
परंपरा के अनुसार गुरु की निंदा करना या विद्या को लेकर अहंकार दिखाना इस दिन विशेष रूप से अनुचित माना जाता है। कई घरों में इस दिन सात्विक भोजन बनता है, मांस-मदिरा से परहेज़ रहता है, और व्रत रखने वाले फल और दूध पर रहते हैं; बुज़ुर्गों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं के लिए परंपरा हल्के व्रत की छूट देती है। जिन वर्षों में उस रात चंद्र ग्रहण पड़ता है, उनमें सूतक मानने वाले परिवार गुरु पूजा सूतक शुरू होने से पहले ही पूरी कर लेते हैं।
भारत और पड़ोसी देशों में गुरु पूर्णिमा
सबसे बड़े आयोजन मठों, आश्रमों और विहारों में होते हैं, जहाँ प्रवचन, व्यास पूजा और भंडारे होते हैं। शास्त्रीय कलाओं में हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के कलाकार तथा कथक, ओडिसी और भरतनाट्यम के विद्यालय ऐसे कार्यक्रम रखते हैं जिनमें शिष्य अपनी कला गुरु को अर्पित करते हैं।
नेपाल में यह दिन विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जहाँ विद्यार्थी अपने शिक्षकों को फूल और छोटे उपहार देते हैं। सारनाथ से श्रीलंका तक बौद्ध विहारों में पहले उपदेश का पाठ होता है, और थेरवाद परंपरा में भिक्षुओं का वर्षावास इस पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होता है। विदेशों में बसे भारतीय परिवारों के लिए मंदिर और सांस्कृतिक संस्थाएँ सत्संग और बच्चों की प्रस्तुतियाँ आयोजित करती हैं।
आषाढ़ पूर्णिमा का ज्योतिषीय पक्ष
हर पूर्णिमा पर चंद्रमा सूर्य के ठीक सामने होता है। आषाढ़ मास का नाम पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्रों से आया है, और इस पूर्णिमा पर चंद्रमा प्रायः इन्हीं नक्षत्रों में या इनके आसपास, निरयण धनु या मकर राशि में होता है, जबकि सूर्य मिथुन या कर्क राशि में होता है। धनु राशि के स्वामी बृहस्पति हैं, इसलिए गुरु की यह पूर्णिमा अक्सर उसी ग्रह की राशि को आलोकित करती है जिसे वैदिक ज्योतिष स्वयं गुरु कहता है।
ज्योतिष में बृहस्पति शिक्षक, ज्ञान, शास्त्र और धर्म के कारक हैं, यानी ठीक वही बातें जिनका यह दिन सम्मान करता है। मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार पूर्णिमा तिथि के देवता चंद्रमा हैं, और यह पंचमी तथा दशमी के साथ पूर्णा तिथियों के वर्ग में आती है।
चंद्र ग्रहण केवल उसी पूर्णिमा पर हो सकता है जो राहु या केतु, यानी चंद्रमा के पात बिंदुओं, के निकट हो, और कुछ वर्षों में ऐसा गुरु पूर्णिमा पर भी हुआ है। तब पंचांग ग्रहण और सूतक का समय तिथि से अलग देते हैं।
इस सप्ताह और क्या है
- शनिवार, 17 जुलाई — कर्क संक्रांति
- रविवार, 18 जुलाई — आषाढ़ पूर्णिमा
जुलाई 2027 के और व्रत-त्योहार
- रविवार, 4 जुलाई — आषाढ़ अमावस्या
- बुधवार, 14 जुलाई — देवशयनी एकादशी
- गुरुवार, 29 जुलाई — कामिका एकादशी
गुरु पूर्णिमा 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गुरु पूर्णिमा 2027 कब है?
गुरु पूर्णिमा 2027 रविवार, 18 जुलाई 2027 को है (नई दिल्ली)। गुरु पूर्णिमा आषाढ़ की पूर्णिमा है, जो सामान्यतः उस दिन मनाई जाती है जिस दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा हो। 2027 की तिथि और नई दिल्ली के लिए पूर्णिमा के आरंभ-समाप्ति का समय इस पृष्ठ पर दिया गया है।
कुछ पंचांगों में गुरु पूर्णिमा 2027 दूसरे दिन क्यों दिखती है?
कभी-कभी पूर्णिमा तिथि किसी दिन सूर्योदय के बाद थोड़ी ही देर रहती है। तब पंचांगकार अवधि के नियम लागू करते हैं, जिन्हें सब जगह एक जैसा नहीं पढ़ा जाता, और सूर्योदय भी शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए एक दिन का अंतर आ सकता है।
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा क्यों कहते हैं?
मान्यता है कि वेदों को व्यवस्थित करने वाले और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था, इसलिए बाद के सभी गुरुओं के मूल गुरु के रूप में पहले उन्हीं की पूजा होती है।
जिनका कोई गुरु नहीं है, वे गुरु पूर्णिमा कैसे मनाएँ?
बहुत से लोग व्यास जी, अपने माता-पिता या किसी पुराने शिक्षक का सम्मान करते हैं, गीता या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं और विद्यार्थियों या किसी विद्यालय को दान देते हैं। इस दिन का मूल भाव कृतज्ञता है, औपचारिकता नहीं।
क्या गुरु पूर्णिमा और बौद्धों का धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस एक ही दिन पड़ते हैं?
दोनों आषाढ़ की पूर्णिमा को पड़ते हैं। बौद्ध सारनाथ में बुद्ध के पहले उपदेश को याद करते हैं, जबकि हिंदू परंपरा व्यास जी और गुरु का पूजन करती है। क्षेत्रीय पंचांगों में कभी-कभी एक दिन का अंतर हो सकता है।
क्या गुरु पूर्णिमा 2027 पर चंद्र ग्रहण है?
ग्रहण हर वर्ष नहीं होता, क्योंकि इसके लिए पूर्णिमा का राहु या केतु के निकट होना ज़रूरी है। यदि 2027 में ग्रहण है, तो आपका पंचांग उसका समय और सूतक बताएगा; इस पृष्ठ पर दिया गया समय पूर्णिमा तिथि का है।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- गुरु पूर्णिमा 2026 — बुधवार, 29 जुलाई 2026
- पिछला त्योहार: अक्षय तृतीया 2027 — 9 मई
- अगला त्योहार: नाग पंचमी 2027 — 6 अगस्त
- 2027 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2027 का त्योहार कैलेंडर
- शुक्रवार, 15 जनवरी — मकर संक्रांति
- गुरुवार, 11 फरवरी — वसंत पंचमी
- शनिवार, 6 मार्च — महाशिवरात्रि
- रविवार, 21 मार्च — होलिका दहन
- सोमवार, 22 मार्च — होली
- बुधवार, 7 अप्रैल — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 15 अप्रैल — राम नवमी
- मंगलवार, 20 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 9 मई — अक्षय तृतीया
- रविवार, 18 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- शुक्रवार, 6 अगस्त — नाग पंचमी
- मंगलवार, 17 अगस्त — रक्षा बंधन
- बुधवार, 25 अगस्त — कृष्ण जन्माष्टमी
- शनिवार, 4 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- गुरुवार, 16 सितंबर — पितृ पक्ष
- बुधवार, 29 सितंबर — सर्व पितृ अमावस्या
- गुरुवार, 30 सितंबर — शारदीय नवरात्रि
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
- रविवार, 31 अक्टूबर — भाई दूज
- गुरुवार, 4 नवंबर — छठ पूजा
- बुधवार, 10 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा