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अक्षय तृतीया 2027: तिथि, शुभ मुहूर्त और अक्षय पुण्य का पर्व

वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाई जाने वाली अक्षय तृतीया, जिसे राजस्थान में आखा तीज कहते हैं, उन गिने-चुने दिनों में से है जिन्हें परंपरा सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूरा का पूरा शुभ मानती है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, और इस दिन के दान, पूजा तथा नए कामों की परंपरा इसी भाव से निकली है। 2027 की तिथि और पूर्वाह्न का पूजा समय यहाँ नई दिल्ली के सूर्योदय के हिसाब से निकाला गया है।

अक्षय तृतीया 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)

अक्षय तृतीया 2027 रविवार, 9 मई 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में अक्षय तृतीया 20 अप्रैल को पड़ने वाले हनुमान जयंती के 19 दिन बाद और 18 जुलाई को पड़ने वाले गुरु पूर्णिमा से 70 दिन पहले है।

तारीखरविवार, 9 मई 2027
तिथिवैशाख शुक्ल तृतीया
तृतीया तिथि8 मई, 11:44 से 9 मई, 09:04 तक
पूर्वाह्न9 मई, 05:39 से 12:18 तक

सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।

9 मई 2027 का पंचांग · Panchang for 9 May 2027

अक्षय तृतीया: अर्थ, नियम और परंपराएँ

अक्षय तृतीया का अर्थ और इससे जुड़ी कथाएँ

अक्षय यानी जो कभी घटे नहीं। मान्यता है कि इस तिथि पर किया गया जप, पूजा या दान ऐसा पुण्य देता है जो कभी समाप्त नहीं होता, इसलिए लोग वे काम इसी दिन शुरू करना पसंद करते हैं जिन्हें वे लंबे समय तक फलता-फूलता देखना चाहते हैं। यह साढ़े तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में से एक है; बाकी हैं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विजयादशमी और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का आधा दिन। इसीलिए बहुत से परिवार इसे अबूझ मुहूर्त मानते हैं, यानी विवाह, गृह प्रवेश या कोई बड़ी खरीदारी अलग से मुहूर्त निकलवाए बिना की जा सकती है।

परंपरा से इसे त्रेता युग के आरंभ का दिन माना जाता है, और अनेक पंचांग इसी तिथि पर भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम की जयंती भी दर्ज करते हैं। लोक में प्रचलित कथाओं के अनुसार इसी दिन सुदामा अपने बचपन के सखा श्रीकृष्ण से मिलने चिवड़े की छोटी-सी पोटली लेकर द्वारका पहुँचे थे, महर्षि वेदव्यास ने गणेश जी को लेखक बनाकर महाभारत लिखवाना शुरू किया था, और वनवास के दिनों में श्रीकृष्ण ने पांडवों और द्रौपदी को अक्षय पात्र दिया था, जिसका अन्न कभी खत्म नहीं होता था।

जैन धर्म में भी यह दिन विशेष है। मान्यता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने लगभग एक वर्ष के उपवास के बाद हस्तिनापुर में श्रेयांस कुमार के हाथों गन्ने का रस ग्रहण करके उपवास तोड़ा था। आज भी वर्षीतप पूरा करने वाले जैन श्रद्धालु इसी दिन गन्ने के रस से पारण करते हैं।

अक्षय तृतीया की तिथि कैसे निकाली जाती है

यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है। तिथि वह अवधि है जिसमें चंद्रमा सूर्य से 12 अंश आगे बढ़ता है, इसलिए तृतीया तब तक रहती है जब तक चंद्रमा सूर्य से 24 से 36 अंश आगे हो। शुक्ल पक्ष का पर्व होने से उत्तर भारत के पूर्णिमांत और गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत के अमांत, दोनों तरह के पंचांगों में इसका नाम एक ही रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः अप्रैल के मध्य से मई के मध्य के बीच पड़ती है।

निर्णय का आधार पूर्वाह्न है, यानी सूर्योदय के बाद दिन का पहला भाग। जिस दिन पूर्वाह्न में तृतीया विद्यमान हो, वही अक्षय तृतीया मानी जाती है। पर तिथि किसी भी समय शुरू हो सकती है, इसलिए कभी वह किसी भी दिन का पूरा पूर्वाह्न नहीं ढकती, तो कभी दोनों दिनों के पूर्वाह्न को छू लेती है। ऐसे में पंचांगकार शास्त्रीय निर्णय-नियम अपनाते हैं, और कुछ सीधे उस दिन को चुनते हैं जिस दिन सूर्योदय के समय तृतीया हो। इसी वजह से ‘अक्षय तृतीया कब है’ खोजने पर कभी-कभी दो तारीखें दिख जाती हैं। इस पृष्ठ का दिन और मुहूर्त नई दिल्ली के सूर्योदय पर आधारित है; तिथि का क्षण पूरी पृथ्वी पर एक ही होता है, पर सूर्योदय हर शहर में अलग होता है।

पूजा विधि और गर्मी के मौसम का दान

दिन की शुरुआत सुबह जल्दी स्नान से होती है; कई लोग नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाते हैं। फिर संकल्प लिया जाता है, जिसमें अपना नाम, स्थान और पूजा का उद्देश्य बोला जाता है, और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की एक साथ पूजा होती है। साफ़ कपड़े पर दोनों की प्रतिमा या चित्र रखकर चंदन, अक्षत, फूल और विष्णु जी को तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं, धूप और घी का दीपक जलाया जाता है, मौसमी फल और मिठाई का भोग लगता है, विष्णु सहस्रनाम या लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ होता है और आरती से पूजा पूरी की जाती है।

कई घरों में इस दिन पितरों के लिए तिल मिले जल से तर्पण भी किया जाता है। फिर भी इस दिन का केंद्र दान ही है, और दान की चीज़ें मौसम के अनुरूप होती हैं, क्योंकि वैशाख आते-आते उत्तर भारत में तेज़ गर्मी पड़ने लगती है: ठंडे पानी से भरा मिट्टी का घड़ा, हाथ का पंखा, छाता, जूते-चप्पल, सत्तू, ककड़ी-खीरा और दूसरे फल तथा दही-चावल। बहुत से कस्बों और गाँवों में दिन भर राहगीरों के लिए प्याऊ लगाया जाता है।

सोना या चाँदी खरीदना आज इस पर्व की सबसे जानी-मानी परंपरा बन गई है। इसे निवेश की योजना के बजाय एक शुभ शुरुआत का प्रतीक समझना बेहतर है; पुरानी परंपरा में दान की गई चीज़ का महत्व खरीदी गई चीज़ से कम नहीं माना जाता। कई लोग इस दिन नया खाता खोलते हैं, व्यापार शुरू करते हैं या नए घर की नींव रखते हैं।

आखा तीज पर क्या करें, क्या न करें

परंपरा के अनुसार इस दिन कुछ न कुछ दान ज़रूर किया जाता है, भले ही वह छोटा हो, और उसे औपचारिकता की तरह नहीं, आदर के साथ दिया जाता है। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी या किसी गरीब परिवार के विवाह में हाथ बँटाना, ये सब इस दिन के उचित काम माने जाते हैं। कई परिवार सुबह की पूजा पूरी होने तक व्रत रखते हैं या केवल फलाहार करते हैं; यह नियम लचीला है, और बुज़ुर्गों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं के लिए परंपरा हल्का व्रत रखने या व्रत न रखने की छूट देती है।

जिस तर्क से अच्छे कर्म का फल अक्षय माना जाता है, उसी तर्क से कई परिवार बुरे कर्मों से भी खास तौर पर बचते हैं। बहुत से घरों में इस दिन झगड़ा, झूठ और कड़वी बोली से परहेज़ किया जाता है, रसोई में मांस और मदिरा नहीं आते, और दरवाज़े पर मदद माँगने आए व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाया जाता। सोने की खरीद पर एक व्यावहारिक बात भी याद रखने लायक है: परंपरा केवल प्रतीकात्मक खरीद की अपेक्षा रखती है, इसलिए घर का बजट बिगाड़कर या उधार लेकर खरीदारी करने की कोई ज़रूरत नहीं है।

मंदिरों, धामों और प्रदेशों में अक्षय तृतीया

राजस्थान में आखा तीज साल के उन दिनों में से है जब सबसे ज़्यादा शादियाँ होती हैं, और इसकी वजह इसका अबूझ मुहूर्त होना ही है। हिमालय में गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट परंपरा से अक्षय तृतीया पर ही सर्दियों के बाद खुलते हैं, और इसी के साथ वहाँ तीर्थयात्रा का मौसम शुरू हो जाता है।

पुरी में भगवान जगन्नाथ की इक्कीस दिन चलने वाली चंदन यात्रा इसी दिन शुरू होती है, और रथ यात्रा के तीनों रथों का निर्माण भी इसी दिन से आरंभ होता है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी के चरण दर्शन पूरे वर्ष में केवल इसी दिन होते हैं। आंध्र प्रदेश के सिंहाचलम मंदिर में साल भर विग्रह पर चढ़ा चंदन का मोटा लेप इसी दिन उतारा जाता है, और चंदनोत्सव में भक्तों को वर्ष में एक बार भगवान के निज रूप के दर्शन मिलते हैं।

ज्योतिष की दृष्टि से अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया की सबसे खास ज्योतिषीय बात यह है कि इस दिन प्रायः सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी उच्च राशि में होते हैं। अक्षय तृतीया के दिन सूर्य निरयण मेष राशि में होता है, जो उसकी उच्च राशि है, और सूर्य से 24 से 36 अंश आगे होने के कारण चंद्रमा प्रायः वृषभ राशि में होता है या उसमें प्रवेश कर रहा होता है, जो उसकी अपनी उच्च राशि है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य आत्मा और तेज का तथा चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए जिस दिन दोनों बलवान हों उसे नए कार्य की नींव के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल समझा जाता है। यदि उस दिन चंद्रमा वृषभ राशि के रोहिणी नक्षत्र में भी हो, तो परंपरा उस अक्षय तृतीया को और भी शुभ मानती है।

मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार तृतीया तिथि की अधिष्ठात्री देवी गौरी हैं, और यह तिथि अष्टमी तथा त्रयोदशी के साथ जया तिथियों के वर्ग में आती है, जिसका अर्थ ही विजय है। शुभ कामों में वर्जित विष्टि करण, जिसे भद्रा कहते हैं, शुक्ल पक्ष की तृतीया में कभी नहीं पड़ता, इसलिए कई पर्वों के मुहूर्त पर जो भद्रा की छाया रहती है, वह यहाँ नहीं होती। फिर भी विवाह जैसे बड़े कदम के लिए कुछ परिवार दिन के भीतर अनुकूल लग्न देखते हैं या व्यक्तिगत जन्म कुंडली पर विचार करते हैं।

इस सप्ताह और क्या है

मई 2027 के और व्रत-त्योहार

अक्षय तृतीया 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अक्षय तृतीया 2027 कब है?

अक्षय तृतीया 2027 रविवार, 9 मई 2027 को है (नई दिल्ली)। यह वैशाख शुक्ल पक्ष की वह तृतीया है जो पूर्वाह्न में विद्यमान हो। 2027 के लिए इसका दिन, तिथि के आरंभ और समाप्ति का समय तथा नई दिल्ली का पूर्वाह्न मुहूर्त इसी पृष्ठ की तिथि-तालिका में दिया गया है।

कुछ पंचांगों में अक्षय तृतीया 2027 अलग दिन क्यों दिखती है?

जब तृतीया दो दिनों के पूर्वाह्न को छूती है या किसी भी दिन का पूर्वाह्न पूरा नहीं ढकती, तब पंचांगकार अलग-अलग शास्त्रीय नियम अपनाते हैं। सूर्योदय भी हर स्थान पर अलग होता है, इसलिए दूसरे शहर के लिए बना पंचांग दूसरा दिन बता सकता है।

क्या अक्षय तृतीया 2027 पर सोना खरीदना ज़रूरी है?

नहीं। सोना खरीदना एक लोकप्रिय आधुनिक रिवाज है, पूजा का अनिवार्य अंग नहीं। पुरानी परंपरा पूजा और दान पर केंद्रित है, और श्रद्धा से दिया गया छोटा-सा दान भी इस दिन के भाव के पूरी तरह अनुरूप है।

अक्षय तृतीया पर क्या दान किया जाता है?

गर्मी से राहत देने वाली चीज़ें: पानी से भरा मिट्टी का घड़ा, पंखा, छाता, जूते-चप्पल, सत्तू, फल और दही-चावल। भूखों को भोजन कराना और प्याऊ लगाना भी इस दिन की परंपरा है।

क्या 2027 में अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती एक ही दिन हैं?

दोनों वैशाख शुक्ल तृतीया से जुड़ी हैं, पर कुछ पंचांग परशुराम जयंती का निर्णय दिन के किसी दूसरे समय के आधार पर करते हैं, इसलिए कुछ वर्षों में दोनों लगातार दो दिनों पर पड़ती हैं। अपने पंचांग में दोनों की प्रविष्टि अलग से देख लें।

दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार

2027 का त्योहार कैलेंडर

हर त्योहार की तारीख उसके शास्त्रीय नियम को नई दिल्ली के पंचांग पर लागू करके निकाली गई है और प्रकाशित पंचांगों से मिलाई गई है। क्षेत्र और परिवार की परंपराएँ अलग हो सकती हैं; अपने घर के लिए कुल पुरोहित या स्थानीय पंचांग की बात को अंतिम मानें।