दिवाली 2027: तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और महत्व
दीपों का पर्व दिवाली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है और इसका मुख्य अनुष्ठान संध्या के समय होने वाली लक्ष्मी पूजा है। इस पृष्ठ पर नई दिल्ली के लिए 2027 की तिथि और मुहूर्त के साथ यह भी बताया गया है कि तिथि कैसे तय होती है, पूजा कैसे की जाती है और समय का इतना महत्व क्यों है।
दिवाली 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)
दिवाली 2027 शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में दिवाली 27 अक्टूबर को पड़ने वाले धनतेरस के 2 दिन बाद और 30 अक्टूबर को पड़ने वाले गोवर्धन पूजा से 1 दिन पहले है।
| तारीख | शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 |
|---|---|
| तिथि | कार्तिक कृष्ण अमावस्या (अमांत पंचांग में आश्विन) |
| अमावस्या तिथि | 28 अक्टूबर, 20:49 से 29 अक्टूबर, 19:07 तक |
| प्रदोष काल | 29 अक्टूबर, 17:35 से 20:11 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
दिवाली: अर्थ, नियम और परंपराएँ
दिवाली क्यों मनाई जाती है
दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति, और इस रात से जुड़ी लगभग हर कथा अंधकार के बाद लौटते प्रकाश की कथा है। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में यह भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद अयोध्या लौटने का उत्सव है। कहा जाता है कि उस रात अयोध्यावासियों ने नगर की गलियों को दीयों की कतारों से सजा दिया था। पुराणों में दूसरी कथा मिलती है: समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया। इसी कारण कार्तिक की अमावस्या की रात उन्हें घर में आमंत्रित करने की रात मानी गई।
वास्तव में दिवाली पाँच दिनों का पर्व है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है, फिर नरक चतुर्दशी आती है जिसे छोटी दिवाली भी कहते हैं, अमावस्या को लक्ष्मी पूजा के साथ उत्सव अपने शिखर पर पहुँचता है, और गोवर्धन पूजा तथा भाई दूज के साथ इसका समापन होता है। जैन परंपरा इसी रात को भगवान महावीर के पावापुरी में निर्वाण के रूप में याद करती है, और सिख समुदाय गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर के किले से रिहाई की स्मृति में बंदी छोड़ दिवस मनाता है।
दिवाली की तिथि कैसे तय होती है
दिवाली सौर कैलेंडर से नहीं, चंद्रमा की गति से तय होती है, इसलिए इसकी तारीख हर साल बदलती है और यह मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर के बीच पड़ती है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह कार्तिक कृष्ण अमावस्या है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अमांत पंचांग में महीने अमावस्या से अमावस्या तक गिने जाते हैं, इसलिए वहाँ इसी रात को आश्विन अमावस्या कहा जाता है। दोनों पद्धतियों में अमावस्या एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है।
तिथि चंद्र दिवस है जिसकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है, और यह शायद ही कभी सूर्योदय के साथ शुरू होती है। अमावस्या किसी दिन दोपहर में आरंभ होकर अगले दिन शाम तक रह सकती है। लक्ष्मी पूजा का शास्त्रीय नियम यह है कि सूर्यास्त के बाद के लगभग ढाई घंटे, यानी प्रदोष काल में अमावस्या व्याप्त हो। जब अमावस्या लगातार दो शामों के प्रदोष काल में रहती है, या दोनों शामों के प्रदोष को केवल आंशिक रूप से छूती है, तब धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों के निर्णय-नियम लागू होते हैं, और पंचांगकार कभी-कभी उनकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं। यही कारण है कि हर साल लोग “दिवाली कब है” खोजते हैं और कभी-कभी दो तारीखें सामने आ जाती हैं। इस पृष्ठ पर दी गई तिथि नई दिल्ली के लिए प्रदोष काल का यही नियम लागू करके निकाली गई है।
लक्ष्मी पूजा विधि: शाम की पूजा कैसे होती है
तैयारी कई दिन पहले घर की अच्छी तरह साफ़-सफ़ाई से शुरू होती है, क्योंकि मान्यता है कि देवी लक्ष्मी साफ़-सुथरे और रोशन घर में ही प्रवेश करती हैं। दिवाली के दिन द्वार पर रंगोली बनाई जाती है, भीतर की ओर आते हुए लक्ष्मी जी के छोटे-छोटे चरण चिह्न बनाए जाते हैं और दरवाज़े पर आम के पत्तों या गेंदे के फूलों का तोरण लगाया जाता है।
पूजा के लिए एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाया जाता है। चावल की छोटी ढेरी पर जल से भरा कलश रखा जाता है, जिस पर आम के पत्ते और नारियल सजाए जाते हैं, और पास में गणेश जी तथा लक्ष्मी जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं। कई परिवार कुबेर, सरस्वती, चाँदी के सिक्के और बही-खाते भी रखते हैं। पूजा संकल्प से शुरू होती है, जिसमें पूजा करने वाला अपना नाम, गोत्र, स्थान और तिथि बोलता है, और सबसे पहले गणेश जी का पूजन होता है। इसके बाद लक्ष्मी जी को रोली, हल्दी, अक्षत, कमल या गेंदे के फूल, धूप, घी का दीपक, मिठाई, फल और खील-बताशे अर्पित किए जाते हैं। अनेक घरों में श्रीसूक्त का पाठ होता है और अंत में आरती की जाती है।
पूजा के बाद पूजा स्थान से दीपक ले जाकर घर के हर दरवाज़े, खिड़की, तुलसी के पौधे और पानी रखने की जगह पर रखे जाते हैं। व्यापारी इस दिन चोपड़ा पूजन करते हैं, जिसमें नए बही-खातों पर रोली से स्वस्तिक बनाकर और शुभ-लाभ लिखकर नए खातों की शुरुआत की जाती है।
क्या करें और क्या न करें
रीति-रिवाज हर परिवार में थोड़े अलग होते हैं, फिर भी कुछ बातें लगभग सब जगह मानी जाती हैं। इस दिन नए या धुले हुए कपड़े पहने जाते हैं, सूर्यास्त से ही घर को रोशन रखा जाता है, पड़ोसियों में मिठाई बाँटी जाती है, बड़ों से मिलकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है और ज़रूरतमंदों को भोजन या वस्त्र दान किए जाते हैं। कई घरों में एक दीपक रात भर जलता रहता है।
परंपरा के अनुसार इस दिन कलह और कटु वचनों से बचा जाता है, संध्या के समय घर में अंधेरा नहीं रखा जाता, और बहुत से घरों में शाम की पूजा के बाद झाड़ू नहीं लगाई जाती ताकि लक्ष्मी जी घर से बाहर न चली जाएँ। लक्ष्मी पूजा की रात मांस और मदिरा से प्रायः परहेज़ किया जाता है। दीये और पटाखे जलाते समय सामान्य सावधानी बरतें और इन्हें पर्दों, बच्चों तथा पशुओं से दूर रखें।
देश के अलग-अलग हिस्सों में दिवाली
बंगाल, ओडिशा और असम में इसी अमावस्या को आधी रात के आसपास काली पूजा होती है। ओडिशा में परिवार पितरों का मार्ग रोशन करने के लिए जूट की डंडियों के गट्ठर जलाते हैं। महाराष्ट्र में घर पर बने पकवानों का थाल, जिसे फराल कहते हैं, दिवाली की पहचान है, और वहाँ कई घरों में लक्ष्मी पूजन के साथ झाड़ू की भी पूजा होती है, जिसे दरिद्रता दूर करने वाली देवी का प्रतीक माना जाता है।
गुजराती व्यापारियों के लिए दिवाली विक्रम संवत का अंतिम दिन है और अगली सुबह बेसतु वरस, यानी नया वर्ष, मनाया जाता है। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में दीपावली मुख्य रूप से नरक चतुर्दशी की भोर में तेल स्नान और नए वस्त्रों के साथ मनाई जाती है, जबकि गोवा में तड़के नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं। नेपाल में यही रात तिहार पर्व का हिस्सा है।
दिवाली की रात का ज्योतिषीय महत्व
अमावस्या के दौरान चंद्रमा सूर्य से बची हुई बारह अंश की दूरी तय करके उसके ठीक साथ आ जाता है, इसलिए चंद्रमा दिखाई नहीं देता। दिवाली पर यह युति निरयण तुला राशि में होती है, जो सूर्य की नीच राशि है। इस तरह यह पर्व उस अमावस्या को पड़ता है जब सूर्य का प्रकाश प्रतीकात्मक रूप से सबसे दुर्बल होता है, और उसी रात दीप जलाना बाहर का उजाला घटने पर भीतर का प्रकाश जगाने के रूप में देखा जाता है।
तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं, जो वैदिक ज्योतिष में सुख, सौंदर्य और वैभव के कारक माने जाते हैं, और यह युति प्रायः चित्रा, स्वाति या विशाखा नक्षत्र में होती है। पूजा के लिए ज्योतिषी स्थिर लग्न को श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि आवाहन के समय उदित स्थिर राशि को स्थायी समृद्धि से जोड़ा जाता है। शरद ऋतु की शाम को यह प्रायः वृषभ लग्न होता है। दूसरी स्थिर राशि सिंह देर रात उदित होती है, और निशीथ काल में पूजा करने वाले सिंह लग्न को चुनते हैं।
इस सप्ताह और क्या है
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — कार्तिक अमावस्या
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
- रविवार, 31 अक्टूबर — भाई दूज
अक्टूबर 2027 के और व्रत-त्योहार
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 11 अक्टूबर — पापांकुशा एकादशी
- शुक्रवार, 15 अक्टूबर — आश्विन पूर्णिमा
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- सोमवार, 18 अक्टूबर — तुला संक्रांति
- सोमवार, 25 अक्टूबर — रमा एकादशी
दिवाली 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिवाली 2027 कब है और लक्ष्मी पूजा किस दिन होगी?
दिवाली 2027 शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027 को है (नई दिल्ली)। दिवाली कार्तिक की वह अमावस्या है जो प्रदोष काल में विद्यमान हो। नई दिल्ली के लिए 2027 की तिथि, अमावस्या के आरंभ और समाप्ति का समय तथा लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त इस पृष्ठ के ऊपर दिए गए हैं।
कुछ पंचांगों में दिवाली 2027 की दो अलग तारीखें क्यों दिखती हैं?
अमावस्या शायद ही कभी सूर्योदय से शुरू होती है, इसलिए यह लगातार दो शामों को छू सकती है। ऐसे में पंचांगकार प्रदोष के शास्त्रीय निर्णय-नियम लागू करते हैं, पर उनकी व्याख्या हमेशा एक जैसी नहीं करते। आपका पारिवारिक पंचांग किस नियम का पालन करता है, यह देख लें।
दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का सबसे शुभ समय कौन सा है?
परंपरा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल को श्रेष्ठ मानती है, विशेषकर जब वृषभ जैसा स्थिर लग्न उदित हो। तांत्रिक या काली पूजा की परंपरा मानने वाले परिवार आधी रात के आसपास निशीथ काल में भी पूजन करते हैं।
क्या दिवाली और दीपावली एक ही पर्व हैं?
हाँ। दीपावली संस्कृत नाम है और दिवाली उसका बोलचाल का रूप। दक्षिण भारत में मुख्य उत्सव प्रायः नरक चतुर्दशी की सुबह होता है, जो उत्तर भारत की लक्ष्मी पूजा से एक दिन पहले पड़ती है।
छोटी दिवाली किस दिन होती है?
छोटी दिवाली नरक चतुर्दशी को कहते हैं, जो लक्ष्मी पूजा से एक दिन पहले आती है। कुछ वर्षों में चतुर्दशी और अमावस्या दोनों एक ही दिन पड़ जाती हैं, तब दोनों पर्व एक ही तारीख को मनाए जाते हैं।
क्या दिवाली के मुहूर्त का समय हर शहर में अलग होता है?
तिथि हर जगह एक है, पर सूर्यास्त, प्रदोष काल और उदित लग्न स्थान पर निर्भर करते हैं, इसलिए एक शहर से दूसरे शहर में पूजा का समय कई मिनट आगे-पीछे हो सकता है। यहाँ दिया गया समय नई दिल्ली का है। अपने शहर के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- दिवाली 2026 — रविवार, 8 नवंबर 2026
- पिछला त्योहार: धनतेरस 2027 — 27 अक्टूबर
- अगला त्योहार: गोवर्धन पूजा 2027 — 30 अक्टूबर
- 2027 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2027 का त्योहार कैलेंडर
- शुक्रवार, 15 जनवरी — मकर संक्रांति
- गुरुवार, 11 फरवरी — वसंत पंचमी
- शनिवार, 6 मार्च — महाशिवरात्रि
- रविवार, 21 मार्च — होलिका दहन
- सोमवार, 22 मार्च — होली
- बुधवार, 7 अप्रैल — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 15 अप्रैल — राम नवमी
- मंगलवार, 20 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 9 मई — अक्षय तृतीया
- रविवार, 18 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- शुक्रवार, 6 अगस्त — नाग पंचमी
- मंगलवार, 17 अगस्त — रक्षा बंधन
- बुधवार, 25 अगस्त — कृष्ण जन्माष्टमी
- शनिवार, 4 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- गुरुवार, 16 सितंबर — पितृ पक्ष
- बुधवार, 29 सितंबर — सर्व पितृ अमावस्या
- गुरुवार, 30 सितंबर — शारदीय नवरात्रि
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
- रविवार, 31 अक्टूबर — भाई दूज
- गुरुवार, 4 नवंबर — छठ पूजा
- बुधवार, 10 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा