छठ पूजा 2027: चार दिन का व्रत, अर्घ्य का समय और महत्व
छठ पूजा सूर्यदेव और छठी मैया का चार दिनों का व्रत है, जो कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक चलता है और जिसके केंद्र में दो अर्घ्य हैं: एक डूबते सूर्य को, दूसरा उगते सूर्य को। इस पृष्ठ पर 2027 की तिथियाँ और संध्या अर्घ्य का समय नई दिल्ली के हिसाब से निकाला गया है; सूर्यास्त और सूर्योदय हर शहर में अलग होते हैं, इसलिए पटना, वाराणसी या कोलकाता के घाटों पर जाने वाले व्रती अपने शहर का समय ज़रूर देख लें। नीचे तिथि का नियम, हर दिन की विधि और इस पर्व का अर्थ दिया गया है।
छठ पूजा 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)
छठ पूजा 2027 गुरुवार, 4 नवंबर 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में छठ पूजा 31 अक्टूबर को पड़ने वाले भाई दूज के 4 दिन बाद और 10 नवंबर को पड़ने वाले देवउठनी एकादशी से 6 दिन पहले है।
| तारीख | गुरुवार, 4 नवंबर 2027 |
|---|---|
| तिथि | कार्तिक शुक्ल षष्ठी |
| नहाय-खाय (पहला दिन) | मंगलवार, 2 नवंबर 2027 |
| खरना (दूसरा दिन) | बुधवार, 3 नवंबर 2027 |
| संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन, सूर्यास्त पर) | गुरुवार, 4 नवंबर 2027 |
| उषा अर्घ्य (चौथा दिन, सूर्योदय पर) | शुक्रवार, 5 नवंबर 2027 |
| षष्ठी तिथि | 3 नवंबर, 19:33 से 4 नवंबर, 21:39 तक |
| सूर्यास्त | 4 नवंबर, 17:30 |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
छठ पूजा: अर्थ, नियम और परंपराएँ
सूर्यदेव, छठी मैया और छठ की कथाएँ
बहुत कम बड़े हिंदू पर्व ऐसे हैं जिनमें प्रत्यक्ष दिखने वाले सूर्य की इतनी सीधी उपासना होती है। व्रती नदी या तालाब के पानी में खड़े होकर सूप से सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं, जिन्हें प्रकाश, ऊष्मा और फसल का दाता माना जाता है। उनके साथ छठी मैया की पूजा होती है, जिन्हें षष्ठी देवी माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में षष्ठी देवी को देवसेना कहा गया है, जो बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं, और छठ के लोकगीतों में उन्हें अक्सर सूर्यदेव की बहन कहकर पुकारा जाता है। लोक परंपरा शाम के अर्घ्य को प्रत्यूषा और सुबह के अर्घ्य को उषा से भी जोड़ती है, जिन्हें सूर्य की अंतिम और पहली किरण की शक्तियाँ माना जाता है।
घाटों पर कई कथाएँ सुनाई जाती हैं। महाभारत के कर्ण सूर्यपुत्र थे, और कहा जाता है कि वे रोज़ कमर तक पानी में खड़े होकर अपने पिता को अर्घ्य देते थे; छठ में व्रती ठीक इसी मुद्रा में खड़े होते हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार द्रौपदी और पांडवों ने कठिन दिनों में यह व्रत रखा था, और एक अन्य कथा कहती है कि अयोध्या लौटने के बाद सीता जी ने मुंगेर में छठ का व्रत किया था। पुराणों में राजा प्रियव्रत की कथा आती है, जिनका पुत्र जन्म के समय ही मृत था और जिनका दुख षष्ठी देवी ने दूर किया; इसी कथा को उनकी पूजा का आरंभ बताया जाता है।
कार्तिक का छठ सबसे बड़ा है, पर वसंत में चैत्र शुक्ल षष्ठी को इसी विधि से चैती छठ भी मनाया जाता है। व्रत रखने वाले को व्रती कहते हैं, और यह व्रत स्त्रियाँ और पुरुष दोनों रखते हैं। पूरा घर, और अक्सर पूरा मोहल्ला, प्रसाद बनाने और घाट की सफ़ाई में हाथ बँटाता है।
छठ के चारों दिन कैसे तय होते हैं
छठ का आधार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है। शुक्ल पक्ष का पर्व होने से उत्तर भारत के पूर्णिमांत और बाकी जगहों के अमांत, दोनों पंचांगों में महीने का नाम कार्तिक ही रहता है। चारों दिन इसी षष्ठी के इर्द-गिर्द क्रम से आते हैं: चतुर्थी को नहाय-खाय, पंचमी को खरना, षष्ठी की शाम संध्या अर्घ्य और सप्तमी की सुबह उषा अर्घ्य। इसलिए छठ प्रायः दिवाली के लगभग चार दिन बाद शुरू होता है, मुख्य संध्या अर्घ्य दिवाली के करीब छह दिन बाद होता है, और यह अक्टूबर के अंत या नवंबर में पड़ता है।
छठ की ख़ास बात यह है कि इसके निर्णायक क्षण स्वयं सूर्यास्त और सूर्योदय हैं। शाम के अर्घ्य के लिए सूर्यास्त के समय षष्ठी होनी चाहिए, और सुबह के अर्घ्य के लिए सूर्योदय के समय सप्तमी। पंचांग में जो अर्घ्य का समय छपता है, वह बस उस स्थान का सूर्यास्त या सूर्योदय है, इसीलिए शहरों के बीच इसमें साफ़ अंतर दिखता है: पटना काफ़ी पूर्व में है, इसलिए वहाँ सूर्य नई दिल्ली से लगभग आधा घंटा पहले डूबता है।
अगर किसी दिन षष्ठी सूर्यास्त से पहले ही समाप्त हो जाए या सूर्यास्त के बाद शुरू हो, तो संध्या अर्घ्य उस दिन होता है जिस दिन शाम के समय षष्ठी विद्यमान हो, और बाकी तीनों दिन भी उसी के साथ खिसक जाते हैं। अलग-अलग पंचांग सूर्यास्त-सूर्योदय के अलग समय या निर्णय-नियमों की अलग व्याख्या अपनाते हैं, इसलिए “छठ पूजा कब है” खोजने पर कभी-कभी दो जवाब मिल जाते हैं। इस पृष्ठ की तिथियाँ नई दिल्ली के सूर्यास्त और सूर्योदय के नियम पर आधारित हैं।
छठ पूजा की विधि: पहले दिन से चौथे दिन तक
पहला दिन नहाय-खाय है, यानी नहाकर खाना। इस दिन व्रती स्नान करते हैं, हो सके तो नदी में, और घर की पूरी सफ़ाई होती है। फिर चावल, चने की दाल और लौकी की सब्ज़ी का एक सात्विक भोजन किया जाता है, जिसमें केवल सेंधा नमक डाला जाता है और जिसे परिवार भी प्रसाद की तरह ग्रहण करता है। दूसरा दिन खरना है, जिसे लोहंडा भी कहते हैं। व्रती दिन भर उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर, जिसे रसिया कहते हैं, और रोटी का भोग लगाकर वही प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसी के साथ 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जिसमें न अन्न लिया जाता है न जल।
तीसरा दिन संध्या अर्घ्य का है। प्रसाद बाँस के सूप और दउरे में सजाया जाता है: ठेकुआ, चावल के आटे के लड्डू यानी कसार, गन्ना, केला, नारियल, बड़ा नींबू जिसे गागल कहते हैं, मूली, शकरकंद, सिंघाड़ा और सुथनी। परिवार छठ के गीत गाते हुए दउरा सिर पर उठाकर घाट तक ले जाता है, और कुछ श्रद्धालु बार-बार ज़मीन पर दंडवत करते हुए पूरा रास्ता तय करते हैं, जिसे दंड देना कहते हैं। व्रती स्त्रियाँ नाक के सिरे से माँग तक लंबा नारंगी सिंदूर लगाती हैं। पानी में खड़े होकर, पश्चिम की ओर मुख करके, व्रती सूप उठाते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
चौथा दिन उषा अर्घ्य का है। परिवार भोर होने से पहले ही घाट पर लौट आता है, व्रती फिर पानी में उतरते हैं, इस बार पूर्व की ओर मुख करके, और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद रिश्तेदारों और पड़ोसियों में प्रसाद बँटता है, बड़े छोटों को आशीर्वाद देते हैं, और व्रती पारण करके लंबा उपवास तोड़ते हैं, जिसकी शुरुआत प्रायः जल और थोड़े से प्रसाद से होती है।
पवित्रता के नियम और व्रत की भावना
छठ अपनी कठोर शुद्धता के लिए जाना जाता है। परंपरा के अनुसार इन चार दिनों में रसोई में प्याज़-लहसुन नहीं आता, केवल सेंधा नमक इस्तेमाल होता है, प्रसाद के बर्तन और चूल्हा रोज़मर्रा के बर्तनों से अलग रखे जाते हैं, और घाट तक पहुँचने से पहले कोई भी प्रसाद को चखता नहीं। मोहल्ले मिलकर घाटों की सफ़ाई और सजावट करते हैं, और कई जगह स्वयंसेवक रास्ते बुहारते हैं ताकि नंगे पाँव चलने या दंड देने वाले श्रद्धालुओं को कोई रुकावट न हो।
व्रत कठिन है, और परंपरा इसे लेकर व्यावहारिक भी है। रीति के अनुसार, जो व्रती निर्जला उपवास पूरा न कर सकें, परिवार के दूसरे सदस्य उनकी मदद कर सकते हैं, और बुज़ुर्ग, अस्वस्थ लोग तथा गर्भवती स्त्रियाँ प्रायः हल्का रूप अपनाते हैं या सहयोगी की भूमिका निभाते हैं। भोजपुरी, मैथिली और मगही के लोकगीत पहली शाम से आख़िरी सुबह तक इस पर्व को स्वर देते हैं, और बहुत से परिवार मानते हैं कि छठ के गीत उतने ही ज़रूरी हैं जितना उपवास।
गंगा के घाटों से कैरिबियन तक छठ
छठ का केंद्र बिहार है, जहाँ गंगा किनारे पटना के घाटों पर भारी भीड़ जुटती है। झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश, जिसमें वाराणसी के घाट भी शामिल हैं, इस पर्व के दूसरे बड़े केंद्र हैं। सीमा पार नेपाल के तराई और मधेश क्षेत्र में भी छठ उतनी ही आस्था से मनाया जाता है, और जनकपुर के तालाब दोनों अर्घ्यों पर श्रद्धालुओं से भर जाते हैं।
रोज़गार की तलाश में गए लोगों के साथ छठ दूर-दूर तक पहुँचा है। दिल्ली में यमुना के घाटों और राजधानी भर में तैयार किए गए बहुत से तालाबों पर, मुंबई के जुहू तट पर और कोलकाता के गंगा किनारे अब हर साल भारी भीड़ उमड़ती है। देश से बाहर मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम और त्रिनिदाद में उन्नीसवीं सदी में गए भोजपुरी भाषी लोगों के वंशज आज भी समुद्र तटों और नदी किनारों पर यह व्रत रखते हैं।
स्थानीय रंग अलग-अलग हैं, गीतों के बोल से लेकर दउरे में रखे फलों तक, पर मूल रूप हर जगह एक है: साफ़ किया गया घाट, कमर तक पानी, मौसमी फल-फूलों से भरा दउरा और दो अर्घ्य, एक साँझ को और एक भोर में।
छठ का ज्योतिषीय पक्ष: षष्ठी, सप्तमी और तुला के सूर्य
तिथियों का मेल ध्यान खींचता है। षष्ठी के शास्त्रीय देवता कार्तिकेय यानी स्कंद हैं, और षष्ठी देवी को स्कंद की पत्नी देवसेना माना जाता है, यानी छठी मैया अपने पति की तिथि पर पूजी जाती हैं। सप्तमी के शास्त्रीय देवता स्वयं सूर्य हैं, इसलिए उषा अर्घ्य सूर्य की अपनी तिथि पर पड़ता है। षष्ठी नंदा वर्ग की तिथि है और सप्तमी भद्रा वर्ग की, और शुक्ल पक्ष की षष्ठी या सप्तमी में विष्टि करण नहीं आता।
छठ के समय सूर्य निरयण तुला राशि में होते हैं, जो उनकी नीच राशि है, और सर्दी की ओर बढ़ते दिन छोटे होते जाते हैं। एक प्रचलित व्याख्या यह है कि यह पर्व सूर्य को ठीक तब पूजता है जब वे सबसे दुर्बल होते हैं, और उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देना ढलान को स्वीकार करके फिर से उदय का स्वागत करने जैसा है।
षष्ठी की शाम चंद्रमा सूर्य से 60 से 72 अंश आगे होता है, यानी सूर्यास्त के समय दक्षिणी आकाश में चंद्रमा की मोटी होती कला पहले से दिखाई देती है। वह प्रायः धनु या मकर राशि में, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा या श्रवण नक्षत्र के क्षेत्र में रहता है। पूर्वाषाढ़ा के अधिष्ठाता देवता आपः यानी जल हैं, और पानी में खड़े होकर की जाने वाली इस उपासना के साथ यह संयोग बहुत सटीक बैठता है।
इस सप्ताह और क्या है
इन सात दिनों में कोई और व्रत या त्योहार नहीं है।
नवंबर 2027 के और व्रत-त्योहार
- बुधवार, 10 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा
- बुधवार, 17 नवंबर — वृश्चिक संक्रांति
- बुधवार, 24 नवंबर — उत्पन्ना एकादशी
- रविवार, 28 नवंबर — मार्गशीर्ष अमावस्या
छठ पूजा 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठ पूजा 2027 कब है और संध्या अर्घ्य किस दिन होगा?
छठ पूजा 2027 गुरुवार, 4 नवंबर 2027 को है (नई दिल्ली)। शाम का अर्घ्य कार्तिक शुक्ल षष्ठी को होता है, जब सूर्यास्त के समय षष्ठी विद्यमान हो, और अगली सुबह सप्तमी को उषा अर्घ्य दिया जाता है। 2027 के चारों दिनों का पूरा क्रम नई दिल्ली के हिसाब से इस पृष्ठ पर समय के साथ दिया गया है।
छठ पूजा 2027 में डूबते सूर्य को अर्घ्य किस समय दें?
अर्घ्य स्थानीय सूर्यास्त पर दिया जाता है, इसलिए समय इस पर निर्भर है कि आप कहाँ हैं। नई दिल्ली का सूर्यास्त इस पृष्ठ पर दिया गया है और उषा अर्घ्य अगले सूर्योदय पर होता है; पटना या कोलकाता जैसे पूर्वी शहरों में दोनों काफ़ी पहले होते हैं।
कुछ पंचांगों में 2027 का खरना अलग दिन क्यों दिखता है?
खरना संध्या अर्घ्य से एक दिन पहले गिना जाता है, और संध्या अर्घ्य इस पर टिका है कि सूर्यास्त के समय षष्ठी हो। अगर तिथि के समय या स्थानीय सूर्यास्त के कारण पंचांग अर्घ्य को अलग दिन रखते हैं, तो खरना और नहाय-खाय भी उसी के साथ बदल जाते हैं।
नहाय-खाय और खरना पर क्या खाया जाता है?
नहाय-खाय पर चावल, चने की दाल और लौकी का एक सात्विक भोजन होता है, जिसमें केवल सेंधा नमक डलता है। खरना की शाम व्रती गुड़ की खीर यानी रसिया और रोटी का भोग लगाकर ग्रहण करते हैं, और उसके बाद निर्जला व्रत शुरू होता है।
क्या पुरुष भी छठ का व्रत रख सकते हैं?
हाँ। व्रतियों में स्त्रियाँ अधिक होती हैं, पर पुरुष भी चारों दिन का पूरा व्रत रखते हैं, और परिवार का हर सदस्य दउरा उठाने से लेकर घाट पर खड़े होने तक हर काम में शामिल रहता है।
ठेकुआ क्या है और इसे क्यों चढ़ाया जाता है?
ठेकुआ गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से हाथ से बनाकर तला जाने वाला कुरकुरा पकवान है। पर्व की शुद्धता के नियमों के साथ बना ठेकुआ छठ का सबसे पहचाना प्रसाद है, जो दोनों अर्घ्यों के लिए सूप और दउरे में रखा जाता है।
अगर व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास पूरा न कर पाए तो?
परंपरा इसमें उदार है: परिवार के सदस्य व्रत में मदद कर सकते हैं या उसे साझा कर सकते हैं, और बुज़ुर्ग, अस्वस्थ या गर्भवती व्रती प्रायः हल्का रूप अपनाकर भी अर्घ्य में शामिल होते हैं।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- छठ पूजा 2026 — रविवार, 15 नवंबर 2026
- पिछला त्योहार: भाई दूज 2027 — 31 अक्टूबर
- अगला त्योहार: देवउठनी एकादशी 2027 — 10 नवंबर
- 2027 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2027 का त्योहार कैलेंडर
- शुक्रवार, 15 जनवरी — मकर संक्रांति
- गुरुवार, 11 फरवरी — वसंत पंचमी
- शनिवार, 6 मार्च — महाशिवरात्रि
- रविवार, 21 मार्च — होलिका दहन
- सोमवार, 22 मार्च — होली
- बुधवार, 7 अप्रैल — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 15 अप्रैल — राम नवमी
- मंगलवार, 20 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 9 मई — अक्षय तृतीया
- रविवार, 18 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- शुक्रवार, 6 अगस्त — नाग पंचमी
- मंगलवार, 17 अगस्त — रक्षा बंधन
- बुधवार, 25 अगस्त — कृष्ण जन्माष्टमी
- शनिवार, 4 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- गुरुवार, 16 सितंबर — पितृ पक्ष
- बुधवार, 29 सितंबर — सर्व पितृ अमावस्या
- गुरुवार, 30 सितंबर — शारदीय नवरात्रि
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
- रविवार, 31 अक्टूबर — भाई दूज
- गुरुवार, 4 नवंबर — छठ पूजा
- बुधवार, 10 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा