शारदीय नवरात्रि 2027: तिथियाँ, घटस्थापना और नौ रातों की पूजा
शरद ऋतु की नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौ रातों तक देवी की आराधना का पर्व है, जिसके ठीक बाद विजयादशमी आती है। यहाँ जानिए कि इसकी शुरुआत और अवधि कैसे तय होती है, कलश कैसे स्थापित किया जाता है और बंगाल, गुजरात, दक्षिण भारत और उत्तर भारत में ये नौ रातें कैसे मनाई जाती हैं। 2027 की तिथियाँ और घटस्थापना मुहूर्त नई दिल्ली के लिए निकाले गए हैं।
शारदीय नवरात्रि 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)
शारदीय नवरात्रि 2027 गुरुवार, 30 सितंबर 2027 से शनिवार, 9 अक्टूबर 2027 तक है (नई दिल्ली)। 2027 में शारदीय नवरात्रि 16 सितंबर को पड़ने वाले पितृ पक्ष के 14 दिन बाद और 9 अक्टूबर को पड़ने वाले दशहरा (विजयादशमी) से 9 दिन पहले है।
| तारीख | गुरुवार, 30 सितंबर 2027 |
|---|---|
| तिथि | आश्विन शुक्ल प्रतिपदा |
| तिथियाँ | गुरुवार, 30 सितंबर 2027 से शनिवार, 9 अक्टूबर 2027 तक |
| प्रतिपदा तिथि (लगभग) | 30 सितंबर, 08:07 से 1 अक्टूबर, 05:51 तक |
सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।
शारदीय नवरात्रि: अर्थ, नियम और परंपराएँ
शरद ऋतु में देवी की विजय
हिंदू वर्ष में चार नवरात्रियाँ आती हैं, पर इनमें शरद ऋतु वाली सबसे व्यापक रूप से मनाई जाती है, इसलिए अक्सर इसे केवल नवरात्रि कहा जाता है। इसका मुख्य ग्रंथ देवी माहात्म्य है, जिसे दुर्गा सप्तशती भी कहते हैं और जो मार्कंडेय पुराण का अंश है। इसमें कथा है कि महिषासुर से हारे हुए देवताओं ने अपना-अपना तेज एक साथ मिलाया, जिससे देवी दुर्गा प्रकट हुईं और उन्होंने महिषासुर से युद्ध करके उसका वध किया। परंपरा के अनुसार यह युद्ध नौ रातों तक चला और दसवें दिन देवी की विजय हुई।
इसी ग्रंथ में देवी के दूसरे युद्धों का भी वर्णन है। योगनिद्रा के रूप में वे भगवान विष्णु को निद्रा से जगाती हैं ताकि वे मधु और कैटभ नाम के दैत्यों का संहार कर सकें, और अंतिम संग्राम में काली और मातृकाओं के साथ मिलकर शुंभ और निशुंभ को पराजित करती हैं। इन रातों में सप्तशती के सभी सात सौ श्लोकों का पाठ बहुत से घरों और मंदिरों की मुख्य साधना है।
बंगाल इसमें एक और स्मृति जोड़ता है। बांग्ला रामकथा कृत्तिवासी रामायण के अनुसार श्रीराम ने रावण से युद्ध करने से पहले शरद ऋतु में देवी की उपासना की और उन्हें उनके नियत समय से हटकर जगाया, इसलिए शरद की यह पूजा अकाल बोधन, यानी असमय जागरण, कहलाती है। उत्तर भारत के बड़े हिस्से में यही रातें रामलीला का मौसम भी हैं, और दसवाँ दिन दुर्गा के साथ-साथ राम की विजय का उत्सव बन जाता है।
नवरात्रि कब शुरू होती है और कभी आठ या दस दिन की क्यों होती है
शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल पक्ष की पहली तिथि, प्रतिपदा, से शुरू होती है और नवमी तक चलती है, जिसके बाद दशमी को विजयादशमी मनाई जाती है। शुक्ल पक्ष का पर्व होने से पूर्णिमांत और अमांत, दोनों पंचांगों में महीने का नाम एक ही रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः सितंबर के आख़िरी दिनों या अक्टूबर में शुरू होती है, और जब लोग “नवरात्रि कब से है” खोजते हैं तो उनका आशय इसी पहले दिन से होता है।
पहले दिन का सबसे अहम समय घटस्थापना का है, यानी पवित्र कलश की स्थापना। शास्त्रीय मत के अनुसार प्रतिपदा रहते हुए सूर्योदय के बाद दिन का पहला तिहाई भाग श्रेष्ठ है, और चित्रा नक्षत्र तथा वैधृति योग वाले समय से बचा जाता है; अगर ऐसा संभव न हो तो दोपहर के आसपास का अभिजित मुहूर्त लिया जाता है। कलश स्थापना की पूरी विधि वसंत और शरद में एक जैसी है, और उसका विस्तार हमारे चैत्र नवरात्रि पृष्ठ पर दिया गया है।
तिथियों की लंबाई घटती-बढ़ती रहती है, इसलिए कभी कोई तिथि पूरी तरह छूट जाती है, जिसे क्षय तिथि कहते हैं, और कभी कोई तिथि दो सूर्योदयों तक रहती है, जिसे वृद्धि तिथि कहते हैं। इसी कारण नवरात्रि नौ की जगह आठ या दस दिन की भी हो सकती है, और अष्टमी या नवमी एक पंचांग से दूसरे में एक दिन आगे-पीछे दिख सकती है। इस पृष्ठ की तिथियाँ और प्रतिपदा का समय नई दिल्ली के लिए गणना किए गए हैं; अपने शहर के लिए घटस्थापना का ठीक मुहूर्त स्थानीय पंचांग में देखें।
घटस्थापना और नौ दिनों की आराधना
प्रतिपदा की सुबह मिट्टी, ताँबे या पीतल के कलश में जल भरकर उसे ऐसी मिट्टी पर रखा जाता है जिसमें जौ बोए गए हों, फिर उस पर आम के पत्ते और लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखकर देवी का आवाहन किया जाता है। बहुत से परिवार अखंड ज्योति जलाते हैं, जो नौ दिन तक बिना बुझे जलती रहती है, और कलश के पास उगते जौ के जवारे देखते रहते हैं।
हर दिन नवदुर्गा, यानी दुर्गा के नौ रूपों, में से एक को समर्पित होता है, जिसमें सुबह-शाम पूजा और आरती के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है। बहुत से भक्त पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, या केवल पहले और आख़िरी दिन, और फल, दूध तथा कुट्टू, सिंघाड़े या राजगिरे के आटे से सेंधा नमक डालकर बने व्यंजन खाते हैं। बुज़ुर्गों, बीमारों और गर्भवती महिलाओं के लिए परंपरा हल्का व्रत रखने की छूट देती है।
अष्टमी या नवमी को, परिवार की परंपरा के अनुसार, कन्या पूजन होता है। प्रायः नौ छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर घर बुलाया जाता है, और उनके साथ अक्सर भैरव के रूप में एक छोटा बालक भी होता है; उनके पैर धोए जाते हैं, उन्हें हलवा, पूरी और काले चने खिलाए जाते हैं और विदा करते समय छोटे उपहार दिए जाते हैं। दशमी को कलश का विधिवत समापन होता है और जवारे बाँटे या विसर्जित किए जाते हैं, और पर्व विजयादशमी में बदल जाता है।
नौ रातों के नियम और मर्यादाएँ
परंपरा के अनुसार प्रतिपदा से पहले घर की सफाई कर ली जाती है और पूरे पर्व में रसोई सात्त्विक रहती है, जिसमें प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा नहीं आते। बहुत से लोग नौ दिनों तक बाल और नाखून नहीं काटते, और कड़ा व्रत रखने वाले ज़मीन पर सोते हैं तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
स्त्रियों और बेटियों का सम्मान पूजा का ही हिस्सा माना जाता है, क्योंकि हर कन्या में देवी का रूप देखा जाता है। जहाँ अखंड ज्योति जल रही हो, वहाँ प्रायः कोई न कोई घर पर रहता है ताकि दीपक कभी अकेला न छूटे। महाराष्ट्र में हर दिन का एक रंग तय होता है और बहुत सी महिलाएँ उस दिन उसी रंग के कपड़े पहनती हैं, जबकि दूसरी जगहों पर परिवार नौ में से कम से कम एक शाम किसी देवी मंदिर के दर्शन को जाते हैं।
दुर्गा पूजा, गरबा, गोलू और दशहरा
बंगाल की दुर्गा पूजा षष्ठी के दिन बोधन, यानी देवी के विधिवत जागरण, से पूरी तरह जीवंत हो उठती है। सप्तमी की भोर में नबपत्रिका, यानी केले के तने के चारों ओर बँधे नौ पौधे, जिन्हें साड़ी पहनाकर कोला बोउ का रूप दिया जाता है, स्नान कराकर प्रतिमा के पास स्थापित की जाती है। अष्टमी को सुबह पुष्पांजलि और कुमारी पूजा होती है, और अष्टमी तथा नवमी के संधिकाल के 48 मिनटों में 108 दीपों और 108 कमलों के साथ संधि पूजा की जाती है। नवमी के बाद दशमी को सुहागिन स्त्रियाँ सिंदूर खेला में देवी को और एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, और फिर विसर्जन होता है।
गुजरात में ये रातें नृत्य की रातें होती हैं। हर रात लोग गरबो, यानी छेदों वाली मिट्टी की मटकी में रखे दीपक, के चारों ओर गरबा करते हैं और बाद में रंगी हुई डंडियों के साथ डांडिया रास खेलते हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में परिवार गोलू या बोम्मई कोलू सजाते हैं, जिसमें गुड़ियाँ विषम संख्या वाली सीढ़ियों पर रखी जाती हैं, और शाम को एक-दूसरे के घर जाकर सुंडल बाँटते हैं। मैसूरु का दशहरा नगर की रक्षक देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित है और दसवें दिन भव्य शोभायात्रा के साथ पूरा होता है।
तेलंगाना में बतुकम्मा मनाया जाता है, जिसमें महिलाएँ मौसमी फूलों को शंकु के आकार में सजाकर उनके चारों ओर गीत गाते हुए घूमती हैं; यह उत्सव महालय अमावस्या से दुर्गाष्टमी तक चलता है। केरल में पूजा वैप्पु के लिए पुस्तकें देवी के सामने रखी जाती हैं, नवमी को सरस्वती पूजा और आयुध पूजा होती है, और विजयादशमी पर बच्चों का अक्षरारंभ कराया जाता है। उत्तर भारत में रात भर चलने वाले जगराते होते हैं और नौ शामों तक रामलीला का मंचन होता है।
कन्या का सूर्य और बढ़ता चंद्रमा: ज्योतिषीय पक्ष
शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में, शरद विषुव के आसपास पड़ती है, जब सूर्य कन्या राशि से तुला की ओर बढ़ रहे होते हैं। आश्विन मास का नाम अश्विनी नक्षत्र से पड़ा है, जिसके पास इस महीने की पूर्णिमा आती है।
पूरे पर्व में चंद्रमा बढ़ता रहता है: प्रतिपदा की शुरुआत में सूर्य पर उसकी बढ़त शून्य अंश होती है और नवमी के अंत तक 108 अंश तक पहुँच जाती है। रोज़ बढ़ती चाँदनी को अक्सर विजय की ओर बढ़ती देवी की शक्ति के रूप में देखा जाता है।
मुहूर्त चिंतामणि की सूची में प्रतिपदा के देवता अग्नि हैं, जो दीप जलाकर शुरू होने वाले पर्व के लिए सार्थक है; अष्टमी के देवता शिव और नवमी की देवी स्वयं दुर्गा हैं, जिससे अंतिम दो दिनों का महत्व और बढ़ जाता है। नवमी रिक्ता तिथि भी है। शुक्ल अष्टमी के पूर्वार्ध में विष्टि करण, यानी भद्रा, रहता है, जिसका उल्लेख विस्तृत पंचांग अष्टमी के समय के साथ करते हैं।
इस सप्ताह और क्या है
- बुधवार, 29 सितंबर — सर्व पितृ अमावस्या
- गुरुवार, 30 सितंबर — आश्विन अमावस्या
सितंबर 2027 के और व्रत-त्योहार
- शनिवार, 4 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- शनिवार, 11 सितंबर — परिवर्तिनी एकादशी
- बुधवार, 15 सितंबर — भाद्रपद पूर्णिमा
- गुरुवार, 16 सितंबर — पितृ पक्ष
- शुक्रवार, 17 सितंबर — कन्या संक्रांति
- रविवार, 26 सितंबर — इंदिरा एकादशी
शारदीय नवरात्रि 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शारदीय नवरात्रि 2027 कब से है?
शारदीय नवरात्रि 2027 गुरुवार, 30 सितंबर 2027 से शनिवार, 9 अक्टूबर 2027 तक है (नई दिल्ली)। यह आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होती है, यानी पितृ पक्ष को पूरा करने वाली महालय अमावस्या के अगले दिन। नई दिल्ली के लिए 2027 की आरंभ तिथि और प्रतिपदा का समय इस पृष्ठ के तिथि वाले हिस्से में दिए गए हैं।
क्या शारदीय नवरात्रि 2027 नौ से कम या ज़्यादा दिन की हो सकती है?
हाँ, कुछ वर्षों में ऐसा होता है। किसी तिथि के क्षय से पर्व आठ दिन का रह जाता है, और किसी तिथि के दो सूर्योदयों तक रहने से दस दिन का हो जाता है। फिर भी पूजा प्रतिपदा से नवमी तक की सभी नौ तिथियों की होती है।
घटस्थापना का सबसे शुभ समय कौन सा है?
शास्त्रीय परंपरा प्रतिपदा रहते हुए सूर्योदय के बाद दिन के पहले तिहाई भाग को श्रेष्ठ मानती है, जिसमें चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग से बचा जाए। ऐसा संभव न हो तो दोपहर के आसपास का अभिजित मुहूर्त मान्य विकल्प है।
कन्या पूजन अष्टमी को करें या नवमी को?
दोनों ही दिन पारंपरिक हैं। परिवार अपनी रीति के अनुसार दिन चुनते हैं, और बहुत से लोग उसी दिन कन्याओं को भोजन कराते हैं जिस दिन व्रत पूरा होता है।
दुर्गा पूजा 2027 में संधि पूजा क्या है?
संधि पूजा अष्टमी के अंत और नवमी की शुरुआत को जोड़ने वाले 48 मिनटों में की जाने वाली आराधना है, जिसमें 108 दीप और 108 कमल अर्पित होते हैं। इसका ठीक समय अष्टमी की समाप्ति पर निर्भर करता है, इसलिए 2027 का समय अपने स्थानीय पंचांग में देखें।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि में क्या अंतर है?
दोनों देवी की नौ रातें हैं। चैत्र नवरात्रि वसंत में आती है, चंद्र नववर्ष से शुरू होती है और राम नवमी पर पूरी होती है, जबकि शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में महिषासुर पर दुर्गा की विजय का उत्सव है और विजयादशमी तक ले जाती है।
दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार
- शारदीय नवरात्रि 2026 — रविवार, 11 अक्टूबर 2026
- पिछला त्योहार: पितृ पक्ष 2027 — 16 सितंबर
- अगला त्योहार: दशहरा (विजयादशमी) 2027 — 9 अक्टूबर
- 2027 के सभी व्रत-त्योहार · आज का पंचांग
2027 का त्योहार कैलेंडर
- शुक्रवार, 15 जनवरी — मकर संक्रांति
- गुरुवार, 11 फरवरी — वसंत पंचमी
- शनिवार, 6 मार्च — महाशिवरात्रि
- रविवार, 21 मार्च — होलिका दहन
- सोमवार, 22 मार्च — होली
- बुधवार, 7 अप्रैल — चैत्र नवरात्रि
- गुरुवार, 15 अप्रैल — राम नवमी
- मंगलवार, 20 अप्रैल — हनुमान जयंती
- रविवार, 9 मई — अक्षय तृतीया
- रविवार, 18 जुलाई — गुरु पूर्णिमा
- शुक्रवार, 6 अगस्त — नाग पंचमी
- मंगलवार, 17 अगस्त — रक्षा बंधन
- बुधवार, 25 अगस्त — कृष्ण जन्माष्टमी
- शनिवार, 4 सितंबर — गणेश चतुर्थी
- गुरुवार, 16 सितंबर — पितृ पक्ष
- बुधवार, 29 सितंबर — सर्व पितृ अमावस्या
- गुरुवार, 30 सितंबर — शारदीय नवरात्रि
- शनिवार, 9 अक्टूबर — दशहरा (विजयादशमी)
- सोमवार, 18 अक्टूबर — करवा चौथ
- बुधवार, 27 अक्टूबर — धनतेरस
- गुरुवार, 28 अक्टूबर — नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली)
- शुक्रवार, 29 अक्टूबर — दिवाली (लक्ष्मी पूजा)
- शनिवार, 30 अक्टूबर — गोवर्धन पूजा
- रविवार, 31 अक्टूबर — भाई दूज
- गुरुवार, 4 नवंबर — छठ पूजा
- बुधवार, 10 नवंबर — देवउठनी एकादशी
- रविवार, 14 नवंबर — कार्तिक पूर्णिमा