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होली 2027: रंगों के पर्व की तिथि, महत्व और परंपराएँ

रंगों का पर्व होली होलिका दहन की अगली सुबह, फाल्गुन पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा तिथि को खेली जाती है। यहाँ 2027 की तिथि नई दिल्ली के हिसाब से निकाली गई है, और साथ में बताया गया है कि यह दिन कैसे तय होता है, इसके पीछे कौन-सी कथाएँ हैं और अलग-अलग प्रदेशों में होली किस तरह मनाई जाती है।

होली 2027: तारीख और समय (नई दिल्ली)

होली 2027 सोमवार, 22 मार्च 2027 को है (नई दिल्ली)। 2027 में होली 21 मार्च को पड़ने वाले होलिका दहन के 1 दिन बाद और 7 अप्रैल को पड़ने वाले चैत्र नवरात्रि से 16 दिन पहले है।

तारीखसोमवार, 22 मार्च 2027
तिथिचैत्र कृष्ण प्रतिपदा (अमांत पंचांग में फाल्गुन)
प्रतिपदा तिथि22 मार्च, 16:14 से 23 मार्च, 14:29 तक
होलिका दहन (पिछली रात)रविवार, 21 मार्च 2027

पंचांगों में अंतर: कुछ पंचांगों में 23 मार्च दिया गया है।

सभी समय नई दिल्ली के लिए भारतीय मानक समय (IST) में हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय के साथ ये समय बदलते हैं, इसलिए वहाँ अपने शहर का पंचांग देखें।

22 मार्च 2027 का पंचांग · Panchang for 22 March 2027

होली: अर्थ, नियम और परंपराएँ

होली का अर्थ और इससे जुड़ी कथाएँ

होली वसंत का स्वागत है। जब उत्तर भारत के खेतों में गेहूँ और सरसों पकने लगते हैं, तब एक सुबह के लिए पड़ोसियों, पीढ़ियों और अलग-अलग तबकों के बीच के फ़ासले मिट जाते हैं। गाल पर लगा गुलाल कहता है कि पुराने गिले-शिकवे माफ़ हुए, और बहुत-से लोग इसी दिन रूठे हुए रिश्तेदारों के घर जाकर गुझिया की थाली पर मनमुटाव खत्म करते हैं।

सबसे प्रिय कथा ब्रज की है, जहाँ श्रीकृष्ण का बचपन बीता। लोक कथा कहती है कि साँवले कृष्ण ने माता यशोदा से शिकायत की कि गोरी राधा उन्हें भला क्यों पसंद करेगी। यशोदा ने हँसकर कहा कि जाओ, राधा के मुख पर जो रंग चाहो लगा दो। कृष्ण ने वैसा ही किया, गोपियाँ भी जुड़ गईं और रंग खेलने की रीत चल पड़ी। इसीलिए ब्रज में होली राधा-कृष्ण की लीला के रूप में गाई जाती है।

पिछली रात का होलिका दहन प्रह्लाद और होलिका की एक अलग कथा से जुड़ा है, जो होलिका दहन वाले पृष्ठ पर दी गई है। बंगाल और ओडिशा में पूर्णिमा का दिन दोल पूर्णिमा भी है, जिसे वैष्णव परंपरा चैतन्य महाप्रभु की जयंती के रूप में मनाती है।

होली की तिथि कैसे तय होती है

होली प्रायः मार्च में और कभी-कभी फ़रवरी के आख़िरी दिनों में पड़ती है। इसका आधार फाल्गुन पूर्णिमा है: पूर्णिमा की शाम होलिका दहन होता है और अगली सुबह, कृष्ण पक्ष की पहली तिथि यानी प्रतिपदा को, रंगवाली होली खेली जाती है, जिसे धुलंडी या धुलेटी भी कहते हैं।

उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग महीने को पूर्णिमा पर समाप्त करता है, इसलिए यह सुबह चैत्र कृष्ण प्रतिपदा कहलाती है; उत्तर प्रदेश, बिहार या राजस्थान में होली सचमुच चैत्र का पहला दिन है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत का अमांत पंचांग फाल्गुन को अमावस्या तक चलाता है, इसलिए वहाँ यही दिन फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा है। दिन एक है, नाम दो।

फिर भी पंचांगों में अंतर आ सकता है, क्योंकि रंग का दिन दहन की रात के पीछे चलता है। शास्त्रीय नियम के अनुसार होलिका दहन प्रदोष काल में, पूर्णिमा तिथि रहते और भद्रा से बचकर किया जाता है; भद्रा, यानी विष्टि करण, पूर्णिमा तिथि के पहले आधे भाग में रहती है। पूर्णिमा दो शामों में बँटी हो तो पंचांगकार अलग-अलग रात चुन सकते हैं और होली भी साथ खिसक जाती है; कुछ वर्षों में तो रंग वाली सुबह सूर्योदय के समय भी पूर्णिमा चल रही होती है, फिर भी रंग उसी सुबह खेला जाता है। इसीलिए हर साल लोग पूछते हैं कि होली कब है। यहाँ दी गई तारीख नई दिल्ली के लिए निकाली गई दहन की रात के अगले दिन की है।

होली की सुबह: पूजा और रंग खेलने का क्रम

होली का कोई लंबा शास्त्रीय पूजन नहीं है, यहाँ रंग ही अर्पण है। सुबह प्रायः घर के मंदिर से शुरू होती है, जहाँ राधा-कृष्ण या कुलदेवता को थोड़ा गुलाल, फूल और मिठाई चढ़ाने के बाद ही किसी और को रंग लगाया जाता है। धुलंडी शब्द धूलि से जुड़ा माना जाता है, और कुछ परिवार सबसे पहले होली की ठंडी राख का टीका माथे पर लगाते हैं।

फिर बड़ों की बारी आती है: छोटे उनके चरणों में गुलाल लगाकर पैर छूते हैं और बड़े गाल पर गुलाल लगाकर आशीर्वाद देते हैं। इसके बाद होली आँगन से निकलकर गली में पहुँचती है, पहले सूखा गुलाल और अबीर, फिर पानी के रंग और पिचकारियाँ, और अक्सर ढोलक की थाप पर फाग। पहले टेसू यानी पलाश के फूल रात भर भिगोकर रंग बनाया जाता था, और बहुत-से परिवार फिर से ऐसे प्राकृतिक, वनस्पति रंग अपनाने लगे हैं।

दोपहर तक लोग नहाकर साफ़ कपड़े पहनते हैं और त्योहार का भोजन करते हैं। शाम होली मिलन की होती है, जब पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर खोए और मेवे से भरी गुझिया, मालपुआ, दही भल्ले और बादाम-सौंफ वाली ठंडाई के साथ मेल-मिलाप होता है। महाराष्ट्र में इस मौसम की खास मिठाई पूरण पोली है, यानी मीठी दाल से भरी रोटी।

होली पर क्या करें और क्या न करें

“बुरा न मानो, होली है” की पुकार कभी ज़बरदस्ती की छूट नहीं थी। परंपरा यही है कि रंग पेश किया जाए, थोपा न जाए; जो पीछे हटे उसे छोड़ दिया जाए, और बुज़ुर्गों, बीमारों तथा छोटे बच्चों को बहुत हल्के हाथ से रंग लगाया जाए या बिल्कुल नहीं। कई समुदायों में जिस परिवार में साल भर के भीतर किसी का निधन हुआ हो, वह रंग नहीं खेलता, और मित्र-रिश्तेदार चुपचाप उस परिवार से मिलने जाते हैं।

बहुत-से लोग पहले त्वचा और बालों पर तेल लगा लेते हैं ताकि रंग आसानी से छूटे, और पुराने कपड़े पहनते हैं। रंग आँखों और मुँह से दूर रखें, तेज़ रसायनों वाले रंगों से बचें, और पशुओं तथा राह चलते लोगों पर रंग न डालें; सूखा गुलाल पानी भी बचाता है। कुछ इलाकों में ठंडाई में भांग का रिवाज है, पर बहुत-से परिवार नशे को घर से दूर रखते हैं, किसी मेहमान पर पीने का दबाव नहीं डाला जाना चाहिए, और नशा करके गाड़ी बिल्कुल न चलाएँ।

ब्रज से मणिपुर तक होली के रंग

सबसे लंबी होली ब्रज की है। पूर्णिमा से पहले राधा जी के गाँव बरसाना में लड्डू होली होती है, जब भक्तों के बीच लड्डू उछाले जाते हैं, और फिर लट्ठमार होली, जब बरसाना की महिलाएँ ढाल लिए नंदगाँव के पुरुषों पर लाठियाँ बरसाती हैं; अगले दिन बरसाना के पुरुष नंदगाँव की महिलाओं का सामना करते हैं। रंगभरी एकादशी के आसपास वृंदावन में फूलों वाली होली होती है, और इसी एकादशी को वाराणसी में काशी विश्वनाथ को गुलाल चढ़ाया जाता है। होली के अगले दिन बलदेव के दाऊजी मंदिर में हुरंगा होता है, जिसमें गाँव की महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ती हैं।

बंगाल और ओडिशा पूर्णिमा के दिन ही दोल यात्रा मनाते हैं, जिसमें राधा-कृष्ण सजे हुए झूलों पर विराजते हैं, और शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ ठाकुर का शुरू किया बसंत उत्सव गीतों से वसंत का स्वागत करता है। मणिपुर के पाँच दिन के याओशांग में चाँदनी रात में थाबल चोंगबा नृत्य होता है। आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा आरंभ किया गया होला मोहल्ला होली के अगले दिन गतका, घुड़सवारी और युद्ध-कौशल के प्रदर्शन से भर जाता है, और कुमाऊँ में बैठकी होली शास्त्रीय रागों में बैठकर तथा खड़ी होली घेरे में खड़े होकर गाई जाती है।

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रंगों का बड़ा उत्सव पाँच दिन बाद रंग पंचमी को होता है, और गोवा का शिगमो लोकनृत्यों और झाँकियों के साथ सड़कों पर उतरता है। राजस्थान में धुलंडी के दिन से, यानी होलिका दहन की अगली सुबह से, महिलाएँ अठारह दिन का गणगौर पूजन, यानी गौरी की आराधना, शुरू करती हैं। नेपाल में भी होली खेली जाती है, और गुयाना, त्रिनिदाद तथा सूरीनाम में गिरमिटिया मज़दूरों के वंशज इसे फगुआ के नाम से मनाते हैं।

ज्योतिष की दृष्टि से होली

होली उस पूर्णिमा के ठीक बाद आती है जब सूर्य और चंद्रमा आमने-सामने रह चुके होते हैं। पूर्णता से थोड़ा आगे बढ़ा चंद्रमा निरयण सिंह या कन्या राशि में, पूर्वाफाल्गुनी से हस्त नक्षत्र तक के क्षेत्र में होता है, जबकि सूर्य कुंभ के अंतिम भाग या मीन के आरंभ में रहकर अपनी उच्च राशि मेष की ओर बढ़ रहा होता है। फाल्गुन का नाम उन फाल्गुनी नक्षत्रों पर पड़ा है जिनके पास इसकी पूर्णिमा होती है, और इसके बाद चैत्र-वैशाख की वसंत ऋतु आती है।

होली की तिथि प्रतिपदा है, जिसके देवता मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार अग्नि हैं। अग्नि-पर्व की अगली सुबह के लिए यह मेल अर्थपूर्ण है, क्योंकि मान्यता है कि रात की अग्नि में पुराना जल चुका है। प्रतिपदा नंदा तिथि है, और नंदा का अर्थ ही आनंद है। भद्रा, जिसे होलिका दहन के लिए ध्यान से देखा जाता है, रंग खेलने पर लागू नहीं होती, और अधिकांश परंपराएँ इसके लिए मुहूर्त नहीं देखतीं। पूर्णिमांत चैत्र यहीं से शुरू होता है और लगभग दो सप्ताह बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया विक्रम संवत आता है, इसलिए होली वर्ष की दहलीज़ पर खड़ा पर्व है।

इस सप्ताह और क्या है

मार्च 2027 के और व्रत-त्योहार

होली 2027: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

होली 2027 कब है, क्या यह होलिका दहन के अगले दिन होती है?

होली 2027 सोमवार, 22 मार्च 2027 को है (नई दिल्ली)। हाँ। रंगवाली होली होलिका दहन की अगली सुबह, फाल्गुन पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा को खेली जाती है। इसी नियम से नई दिल्ली के लिए निकाली गई 2027 की तारीख, दहन की रात के साथ, पृष्ठ के आरंभ में दी गई है।

कुछ पंचांगों में होली 2027 अलग दिन क्यों दिखती है?

होली दहन की रात के पीछे चलती है, और दहन के लिए प्रदोष काल में भद्रा रहित पूर्णिमा चाहिए। पूर्णिमा दो शामों में असमान रूप से बँटी हो तो पंचांगकार दहन के लिए अलग रातें चुन सकते हैं और रंग का दिन भी साथ खिसक जाता है। रंग पंचमी या दोल पूर्णिमा जैसी क्षेत्रीय तिथियाँ भी अलग होती हैं।

होली, धुलंडी और धुलेटी में क्या अंतर है?

ये एक ही दिन के नाम हैं। ‘होली’ नाम अक्सर दो दिन के पूरे पर्व के लिए बोला जाता है, जबकि उत्तर भारत में धुलंडी और गुजरात में धुलेटी दहन के बाद वाले रंग के दिन को कहते हैं, जिसे रंगवाली होली भी कहा जाता है।

क्या होली 2027 पर रंग खेलने का कोई शुभ मुहूर्त है?

अधिकांश परंपराओं में रंग खेलना मुहूर्त से बँधा नहीं है; यह सुबह के अर्पण और बड़ों के आशीर्वाद के बाद शुरू होकर प्रायः दोपहर तक थम जाता है। इस पर्व में मुहूर्त देखकर किया जाने वाला अनुष्ठान पिछली रात का होलिका दहन है।

ब्रज की कौन-सी होली सबसे प्रसिद्ध है?

पूर्णिमा से पहले बरसाना और नंदगाँव की लड्डू होली और लट्ठमार होली, रंगभरी एकादशी के आसपास वृंदावन की फूलों वाली होली, और होली के अगले दिन बलदेव में दाऊजी का हुरंगा। इनकी तारीखें हर साल स्थानीय पंचांग से तय होती हैं।

उत्तर भारत में होली चैत्र में और बाकी जगह फाल्गुन में क्यों गिनी जाती है?

पूर्णिमांत में महीना पूर्णिमा पर बदल जाता है, इसलिए फाल्गुन पूर्णिमा के बाद की सुबह चैत्र में आती है, जबकि अमांत में फाल्गुन अमावस्या तक चलता है। पर्व का दिन दोनों में एक ही है।

दूसरे वर्ष और दूसरे त्योहार

2027 का त्योहार कैलेंडर

हर त्योहार की तारीख उसके शास्त्रीय नियम को नई दिल्ली के पंचांग पर लागू करके निकाली गई है और प्रकाशित पंचांगों से मिलाई गई है। क्षेत्र और परिवार की परंपराएँ अलग हो सकती हैं; अपने घर के लिए कुल पुरोहित या स्थानीय पंचांग की बात को अंतिम मानें।